हिन्दी के कवि

बालकृष्ण राव

(1913-1975 ई.)

प्रसिध्द लिबरल पत्रकार और नेता सर सी.वाय. चिंतामणि के पुत्र बालकृष्ण राव का जन्म प्रयाग में हुआ। 16 वर्ष तक भारतीय सिविल सर्र्विस में कार्य करके 1954 में नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। पश्चात् 'लीडर अखबार से संबध्द रहे तथा स्वतंत्र पत्रकारिता करते रहे। 'कादम्बिनी पत्रिका का संपादन किया तथा आकाशवाणी के निदेशक रहे। प्रयोगवादी नई कविता के विकास में इनका विशिष्ट योगदान है। मुख्य काव्य-कृतियाँ हैं- 'कौमुदी, 'कवि और छवि, 'आभास, 'रात बीती तथा 'हमारी राह आदि।

कौन जाने?
झुक रही है भूमि बायीं ओर, फिर भी
कौन जाने?
नियति की ऑंखें बचाकर,
आज धारा दाहिने बह जाए।
जाने किस किरण-शर के वरद आघात से
निर्वर्ण रेखा-चित्र, बीती रात का,
कब रँग उठे। सहसा मुखर हो
मूक क्या कह जाए?
'सम्भव क्या नहीं है आज-
लोहित लेखनी प्राची क्षितिज की,
कर रही है प्रेरणा, यह प्रश्न अंकित? कौन जाने
आज ही नि:शेष हों सारे सँजोये स्वप्न,
दिन की सिध्दियों में
कौन जाने
शेष फिर भी,
एक नूतन स्वप्न की सम्भावना रह जाए।
आज ही होगा
मानना चाहता है आज ही?
तो मान ले
त्योहार का दिन
आज ही होगा।
उमंगें यों अकारण ही नहीं उठतीं;
न अनदेखे इशारों पर,
कभी यों नाचता है मन।
खुले-से लग रहे हैं द्वार मंदिर के?
बढा पग-
मूर्ति के शृंगार का दिन
आज ही होगा।
न जाने आज क्यों जी चाहता है
स्वर मिलाकर
अनसुने स्वर में किसी के
कर उठे जयकार।
न जाने क्यों
बिना पाए हुए ही दान,
याचक मन
विकल है।
व्यक्त करने के लिए आभार।
कोई तो, कहीं तो
प्रेरणा का स्रोत होगा ही,
उमंगें यों अकारण ही नहीं उठतीं,
नदी में बाढ आई है,
कहीं पानी गिरा होगा।
अचानक शिथिल-बंधन हो रहा है आज
मोहासन्न बंदी मन-
किसी की हो
कहीं कोई भगीरथ-साधना पूरी हुई होगी,
किसी भागीरथी के भूमि पर अवतार का दिन आज ही होगा।

 

 

 

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