हिन्दी के कवि

बेनी प्रवीन

(1817 ई. अनुमानित)

बेनी प्रवीन का मूल नाम बेनीदीन बाजपेई था। ये लखनऊ के निवासी थे। इनके आश्रयदाता लखनऊ के 'लल्लनजी थे, जिन्होंने कदाचित् इन्हें 'प्रवीन की उपाधि प्रदान की थी। उनके लिए इन्होंने 'नवरस-तरंग लिखा, जिसमें नायक-नायिका भेद वर्णित है। भाषागत प्रौता, भावों का सरस प्रवाह, गहरी भावुकता तथा चित्रांकन की मार्मिकता के कारण ये रीति-काल के सरस कवि माने जाते हैं। अन्य ग्रंथ हैं- 'नानाराव प्रकाश तथा 'शृंगार-भूषण। ये अलंकार एवं शृंगार ग्रंथ हैं।

पद

करि की चुराई चाल, सिंह को चुरायो कटि,
ससि को चुरायो मुख, नासा चोरी कीर की।
पिक को चुरायो बैन, मृग को चुरायो नैन,
दसन अनार हांसी बीजरी गंभीर की॥

कहै 'कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराइ लीनी।
रती-रती शोभा सब रति के शरीर की।
अब तौ कन्हैया जू को चित्त  चुराई लीन्ही,
चोरटी है गोरटी या छोरटी अहीर की॥

धूधर सी वन, धूमसी धामन, गावन तान लगै नर बोरी।
बौरी लता, बनिता भई बौरी, सु औधि अध्याय रही अब थोरी॥

'बेनी बसंत के आवत ही बिन कंत अनंत सहै दुख कोरी।
ओरी! घरै हरि आए न जो, पहिले हौं जरौं, जरिहै फिर होरी॥

राधा औ माधो खदोउ भीजत, बा झरि में झपकै बन मांहीं।
'बेनी गए जुरि बातन में, सिर पातन के छतना गल बांहीं॥

पामरी प्यारी उत प्यारे को, प्यारौ पितंबर की करै छांहीं।
आपस में लहालेह में, छोह में, का को भीजिबे की सुधि नांहीं॥

 

 

 

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