हिन्दी के कवि

भारत भूषण अग्रवाल

(1919-1975 ई.)

भारत भूषण अग्रवाल का जन्म मथुरा में हुआ। इन्होंने आगरा तथा दिल्ली में उच्च शिक्षा प्राप्त की। फिर आकाशवाणी में तथा अनेक साहित्यिक संस्थाओं में सेवा की। भारत भूषण ने द्विवेदी युग की तुकांत कविता से आरंभ कर प्रयोगवादी युग तक के अनेक रूपों में सृजन किया। ये तारसप्तक के कवियों में से हैं। इनके मुख्य कविता-संग्रह हैं : 'कवि के बंधन, 'जागते रहो, 'ओ अप्रस्तुत मन, 'अनुपस्थित लोग, 'मुक्तिमार्ग, 'एक उठा हुआ हाथ तथा 'उतना वह सूरज जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

मूर्ति तो हटी, परन्तु
तम में भटकती हुई अनगिनती आंखों को
जिसने नई दृष्टि दी,
खोल दिए सम्मुख नए क्षितिज,
नूतन आलोक से मंडित की सारी भूमि-
जन-मन के मुक्तिदूत
उस देवता के प्रति,
श्रध्दा से प्रेरित हो,
समवेत जन ने,
प्रतिमा प्रतिष्ठित की अपने सम्मुख विराट!
अपने हृदयों में बसी ऊर्ध्यबाहु कल्पना,
पत्थर पर आंकी अति यत्न से!
मूर्ति वह अद्वितीय, महाकाय,
शीश पर जिसके हाथ, धरते थे मेघराज,
चरणों में जिसके जन, झुकते थे भक्ति से
अंजलि के फूल-भार के समान,
अधरों पर जिसके थी मंत्रमयी मुसकान
उल्लसित करती थी लोक-प्राण!
यों ही दिन बीत चले,
और वह मूर्ति-
दिन-पर-दिन, स्वयमेव
मानो और बडी, और बडी होती चली गई!
जड प्रतिमा में बंद यह रहस्य, यह जादू,
कितने समझ सके, कितने न समझे- यह कहना कठिन है।
क्योंकि उसे पूजा सब जन ने
भूलकर एक छोटा सत्य यह,
पत्थर न घटता है, न बढता है रंच मात्र,
मूर्ति बडी होती जा रही थी क्योंकि
वे स्वयं छोटे होते जाते थे,
भूलकर एक बडा सत्य यह,
मूर्ति की विराटता ने ढंक लिए वे क्षितिज,
देवता ने एक-एक करके जो खोले थे।
आखिर में एक दिन ऐसा भी आ पहुंचा,
मूर्ति जब बन चुकी थी आसमान,
और जन बन चुके थे चूहों-से, मेंढक-से,
छोटे-ओछे, नगण्य!
क्षितिजों के सूर्य की जगह भी वह मुस्कान,
जिसमें नहीं था कोई अपना आलोक-स्रोत!
होकर वे तम में बंद
फिर छटपटाने लगे!
तभी कुछ साहसी जनों ने बढ
अपनी लघुता का ज्ञान दिया हर व्यक्ति को।
और फिर,
शून्य बन जाने के भय से अनुप्राणित हो-
समवेत जन ने-
अपने ही हाथों से गढी हुई देवता की मूर्ति वह
तोड डाली-
छैनी से, टांकी से, हथौडी से,
जिसको जो मिला उसी शस्त्र से,
गढते समय भी ऐसा उत्साह कब था?
देखा तब सबने आश्चर्य से :
प्रतिमा की ओट में जो रमी रही एक युग,
उनकी वे दृष्टियां अब असमर्थ थीं,
कि सह सके सहज प्रकाश आसमान का!
और फिर सबने यह देखा असमंजस से :
मूर्ति तो हटी, परंतु सामने डटा था प्रश्न चिह्न यह :
मूंद लें वे आंखें या कि प्रतिमा गढें नई?
हर अंधी श्रध्दा की परिणति है यह खण्डन!
हर खण्डित मूर्ति का प्रसाद है यह प्रश्नचिह्न!

फूटा प्रभात
फूटा प्रभात, फूटा विहान,
बह चले रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्झर के स्व
झर-झर, झर-झर।
प्राची का यह अरुणाभ क्षितिज,
मानो अम्बर की सरसी में
फूला कोई रिक्तम गुलाब, रक्तिम सरसिज।
धीरे-धीरे,
लो, फैल चली आलोक रेख
धुल गया तिमिर, बह गई निशा :
चहुं ओर देख,
घुल रही विभा, विमलाभ कांति।
अब दिशा-दिशा
सस्मित,
विस्मित,
खुल गए द्वार, हंस रही उषा।
खुल गए द्वार, दृग, खुले कंठ,
खुल गए मुकुल।
शतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुंजार लिए
खुल गए बंध, छवि के बंधन।
जागो जगती के सुप्त बाल!
पलकों की पंखुरियां खोलो, खोलो मधुकर के अलस बंध
दृग भर
समेट तो लो यह श्री, यह कांति
बही आती दिगंत से, यह छवि की सरिता अमंद
झर-झर, झर-झर।
फूटा प्रभात, फूटा विहान,
छूटे दिनकर के शर ज्यों छवि के वह्नि-बाण
(केशर फूलों के प्रखर बाण)
आलोकित जिनसे धरा
प्रस्फुटित पुष्पों के प्रज्वलित दीप,
लौ भरे सीप।
फूटीं किरणें ज्यों वह्नि-बाण, ज्यों ज्योति-शल्य,
तरू-वन में जिनसे लगी आग।
लहरों के गीले गाल, चमकते ज्यों प्रवाल,
अनुराग-लाल।

समाधि लेख
रस तो अनंत था, अंजुरी भर ही पिया,
जी में वसंत था, एक फूल ही दिया।
मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है,
कैसे बडे युग में कैसा छोटा जीवन जिया।

परिणति
उस दिन भी ऐसी ही रात थी।
ऐसी ही चांदनी थी।
उस दिन भी ऐसे ही अकस्मात्,
हम-तुम मिल गए थे।
उस दिन भी इसी पार्क की इसी बेंच पर बैठ कर,
हमने घंटों बाते की थीं-
घर की, बाहर की, दुनिया भर की।
पर एक बात हम ओठों पर न ला पाए थे
जिसे हम दोनों,
मन ही मन,
माला की तरह फेरते रहे थे।

आज भी वैसी ही रात है,
वैसी ही चांदनी है।
आज भी वैसे ही अकस्मात्,
हम-तुम मिल गए हैं।
आज भी उसी पार्क की उसी बेंच पर बैठकर,
हमने घंटों बातें की हैं-
घर की, बाहर की, दुनिया भर की।
पर एक बात हम ओठों पर नहीं ला पाए हैं,
जिसे हम दोनों-
मन ही मन,
माला की तरह फेरते रहे हैं।

वही रात है,
वही चांदनी है।
वही वंचना की भूल-भुलैया है।
पर इस एक समानता को छोडकर,
देखो तो-
आज हम कितने असमान हो गए हैं।
पर नहीं,
अभी एक समानता और भी है,
आज हम दोनों जाने की जल्दी में है,
तुम्हारा बच्चा भूखा होगा,
मेरी सिगरेटें खत्म हो चुकी हैं।

विदेह
आज जब घर पहुंचा शाम को
तो बडी अजीब घटना हुई
मेरी ओर किसी ने भी कोई ध्यान ही न दिया।
चाय को न पूछा आके पत्नी ने
बच्चे भी दूसरे ही कमरे में बैठे रहे
नौकर भी बडे ढीठ ढंग से झाडू लगाता रहा
मानो मैं हूँ ही नहीं-
तो क्या मैं हूँ ही नहीं?

और तब विस्मय के साथ यह बोध मन में जगा
अरे, मेरी देह आज कहां है?
रेडियो चलाने को हुआ-हाथ गायब हें
बोलने को हुआ-मुंह लुप्त है
दृष्टि है परन्तु हाय! आंखों का पता नहीं
सोचता हूँ- पर सिर शायद नदारद है
तो फिर-तो फिर मैं भला घर कैसे आया हूँ

और तब धीरे-धीरे ज्ञान हुआ
भूल से मैं सिर छोड आया हूँ दफ्तर में
हाथ बस में ही टंगे रह गए
आंखें जरूर फाइलों में ही उलझ गईं
मुंह टेलीफोन से ही चिपटा सटा होगा
और पैर हो न हो क्यू में रह गए हैं-
तभी तो मैं आज आया हूँ विदेह ही!

देहहीन जीवन की कल्पना तो
भारतीय संस्कृति का सार है
पर क्या उसमें यह थकान भी शामिल है
जो मुझ अंगहीन को दबोचे ही जाती है?

 

 

 

 

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