हिन्दी के कवि

भीषनजी

(16वीं शताब्दी)

संत भीषनजी लखनऊ के पास काकोरी ग्राम के निवासी थे। ये रैदास और कबीर की भाँति गृहस्थ आश्रम में रहकर भक्ति करते थे। ये बडे दयालु और परोपकारी थे। दादू, नानक और मलूकदास की परंपरा में भीषनजी भी निर्गुण राम के भक्त थे। ये विद्वान तथा धर्मशास्त्रों के ज्ञाता थे। इनकी भाषा मुहावरेदार है, पद नीति और ज्ञानविषयक हैं।

पद

नाद स्वाद तन बाद तज्यो मृग है मन मोहत।
परयो जाल जल मीन लीन रसना रस सोहत।
भृंग नासिका बास केतकी कंटक छीनो।
दीपक ज्योति पतंग रूप रस नयनन्ह दीनो।

एक व्याधि गज काम बस, परयो खाडे सिर कूटिहै।
पंच व्याधि बस 'भीखजन सो कैसे करि छूटिहै॥
नैनहु नीरु बहै तनु षीना, भये केस दुधवानी।
रुँधा कंठु सबदु नहीं उचरै, अब किया करहि परानी॥
राम राइ होहि वैद बनवारी।
अपने संतह लेहु उबारी॥

 

 

 

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