हिन्दी के कवि

चन्द्रदेव सिंह

(जन्म 1933 ई.)

 

चन्द्रदेव सिंह का जन्म बलिया (उ.प्र.) के एक किसान परिवार में हुआ। शिक्षा एवं पर्यटन में इनकी विशेष रुचि रहीं। इनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं : 'स्नेह-सुरभि, 'सरसों के फूल, 'बुध्दं शरणम् तथा 'युगनायक। इन्होंने कविताएं 57-58 'पांच जोड बांसुरी तथा 'आवाजे-जिंदगी का सम्पादन किया है। नवगीत, गजल, समीक्षाएं तथा 'आत्महत्या से पहले (उपन्यास) लिखा है।

बांधो मत

बांधो मत
बांधो मत आंचर के खूंटे
कुछ फूल और
बांधो मत।

पिछली यात्राओं के धूलिकण
अभि तलक
पैरों से लगे हैं
गलियों, चौराहों पर
पेडों, दीवारों पर
लिखे हुए उपहासों के अक्षर
अभी तक टंगे हैं!
मांगो मत
मांगो मत-दर्द के सिवाने पर आकर
कुछ शब्द और
मांगो मत।
अभी मन में- आल्हा, कजरी, चैता,
बिरहा के डेरे हैं
अभी मेरे आसपास
अनगिन अभिशापों
अनपेक्षित शंकाओं के लाख-लाख घेरे हैं
रोपो मत
रोपो मत- पीडा के वन में कुछ शूल और।
रोपो मत।
बांधो मत
बांधो मत- आंचल के खूंटे कुछ फूल और
बांधो मत।
***
बोल आखिरी
लोगे तो ले लो
है बोल आखिरी

दुनिया का सबसे ऊंचा
नगाधिराज
एक महासागर;
एक महातीर्थ राज
राजघाट लोगे?
या लाल किला ले लो
है बोल आखिरी।

ॠषियों की वाणी
एक अद्भुत इतिहास
भिन्न-भिन्न धर्म, जाति
भाषा, विश्वास
गंगा है, गीता है
चाहे जो ले लो
है बोल आखिरी।

मानव निर्मित हो
या प्रकृति ने गढी
हर एक शै है
नीलम पर चढी
भाषा है, संसद है
जिससे भी खेलो।
है बोल आखिरी।
लोगे तो ले लो
है बोल आखिरी।
***
दिन ढल गया
सुबह ही दिन ढल गया।
रास्ता ही रास्ते को छल गया।

हम चले थे-हाथ में सूरज
निगाहों में हिमालय के शिखर बांधे
क्या पता था
काफिले के रहनुमा ही डाल देंगे
बीच में कांधे!
और ऐेसे मोड पर
जब अंधेरा ही नहीं बस
रहजनों के काफिले भी मिल गए हैं
फरिश्तों के-से लबादे ओढ कर।
अब नहीं पहचान का
संकट कहीं;
आस्था का स्वत्व ही
निष्फल गया।

सुबह ही दिन ढल गया।
रास्ता ही रास्ते को छल गया।

 

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