हिन्दी के कवि

चरणदास

(1703-1782ई.)

चरणदास के पिता मुरलीधर राजस्थान के डेहरा गांव के रहने वााले ढूसर बनिया कुल के थे। पिता के स्वर्गवास के पश्चात चरणदास दिल्ली रहने लगे। बालपन से ही भगवत्-दर्शन की तीव्र आकांक्षा थी। इनके गुरु का नाम सुखानंद था। चरणदास ने 14 वर्ष तक योगाभ्यास किया। इन्हें सिध्दि प्राप्त हुई तथा इनका एक विशाल सत्संग-मंडल बन गया तथा हजारों लोगों को इन्होंने ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया। इनके पद और साखी सगुण एवं निर्गुण दोनों प्रकार की भक्ति पर लिखे गए हैं। इनकी वाणी सहज, सरल और प्रभावशाली है।

पद

साधो निंदक मित्र हमारा।
निंदक को निकटै ही राखूं होन न दें नियारा।
पाछे निंदा करि अघ धोवै, सुनि मन मिटै बिकारा।
जैसे सोना तापि अगिन मैं, निरमल करै सोनारा॥

घन अहरन कसि हीरा निबटै, कीमत लच्छ हजारा।
ऐसे जांचत दुष्ट संत कूं, करन जगत उजियारा॥

जोग जग्य जप पाप कटन हितु, करै सकल संसारा।
बिन करनी मम करम कठिन सब, मेटै निंदक प्यारा।

सुखी रहो निंदक जग माहीं, रोग न हो तन सारा।
हमरी निंदा करने वाला, उतरै भवनिधि पारा॥

निंदक के चरणों की अस्तुति, भाखौं बारंबारा।
'चरणदास कहै सुनिए साधो, निंदक साधक भारा॥

साधौ जो पकरी सो पकरी।
अबतो टेक गही सुमिरन की, ज्यों हारिल की लकरी॥

ज्यों सूरा ने सस्तर लीन्हों, ज्यों बनिए ने तखरी।
ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा, तार गह्यो ज्यों मकरी॥

ज्यों कामी को तिरिया प्यारी, ज्यों किरपिन कूं दमरी।
ऐसे हमकूं राम पियारे, ज्यों बालक कूं ममरी॥

ज्यों दीपक कूं तेल पियारो, ज्यों पावक कूं समरी।
ज्यूं मछली को नीर पियारो, बिछुरे देखै जमरी॥

साधों के संग हरिगुन गाऊं, ताते जीवन हमरी
'चरनदास शुकदेव दृढायो, और छोटी सब गमरी॥

 

साखी

सतगुरु से मांगूं यही, मोहि गरीबी देहु।
दूर बडप्पन कीजिए, नान्हा ही कर लेहु॥

बचन लगा गुरुदेव का, छुटे राज के ताज।
हीरा मोती नारि सुत सजन गेह गज बाज॥

प्रभु अपने सुख सूं कहेव, साधू मेरी देह।
उनके चरनन की मुझे प्यारी लागै खेह॥

प्रेमी को रिनिया रं यही हमारो सूल।
चारि मुक्ति दइ ब्याज मैं, दे न सकूं अब मूल॥

भक्त हमारो पग धरै, तहां धरूं मैं हाथ।
लारे लागो ही फिरूं, कबं न छोडूं साथ॥

प्रिथवी पावन होत है, सब ही तीरथ आद।
चरनदास हरि यौं कहैं, चरन धरैं जहं साध॥

मन मारे तन बस करै, साधै सकल सरीर।
फिकर फारि कफनी करै, ताको नाम फकीर॥

जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों जिव्हा मुख माहिं।
घीव घना भच्छन करै, तो भी चिकनी नाहिं॥

चरनदास यों कहत हैं, सुनियो संत सुजान।
मुक्तिमूल आधीनता, नरक मूल अभिमान॥

सदगुरु शब्दी लागिया नावक का सा तीर।
कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेम की पीर॥

 

 

 

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