हिन्दी के कवि

दीन दरवेश

(18वीं शताब्दी)

दीन दरवेश पाटन अथवा पालनपुर राज्य के निवासी थे तथा जाति के लोहार थे। ये ईस्ट इंडिया कंपनी में मिस्त्री का काम करते थे। इन्होंने नाथपंथी बाबा बालानाथ से दीक्षा ली थी तथा अनेक तीर्थों का भ्रमण किया था। सूफियों एवं वेदांतियों के मतों का मंथन करके इन्होंने अपना एक अलग मत स्थापित किया। दीन दरवेश की कुंडलियां प्रसिध्द हैं जिनमें प्रेम, त्याग, परोपकार और भक्ति के भाव पाए जाते हैं।

कुण्डलियां

हिंदु कहें सो हम बडे, मुसलमान कहें हम्म।
एक मूंग दो फाडा हैं, कुण ज्यादा कुण कम्म॥

कुण ज्यादा कुण कम्म, कभी करना नहिं कजिया।
एक भगत हो राम, दुजा रहिमान सो रजिया॥

कहै 'दीन दरवेश, दोय सरिता मिलि सिंधू।
सबका साहब एक, एक मुसलिम एक हिंदू॥

जितना दीखै थिर नहीं, थिर है निरंजन नाम।
ठाठ बाट नर थिर नहीं, नाहीं थिर धन धाम॥

नाहीं थिर धन धाम, गाम घर हस्ती घोडा।
नजर जात थिर नाहिं, नाहिं थिर साथ संजोडा॥

कहै 'दीन दरवेश कहां इतने पर इतना ।
थिर निज मन सत् शब्द, नाहिं थिर दीखै जितना।

 

 

 

top