हिन्दी के कवि

गजानन माधव मुक्तिबोध

(1917-1964 ई.)

मुक्तिबोध का जन्म श्यौपुर, ग्वालियर में हुआ। नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया तथा आजीवन साहित्य-सृजन और पत्रकारिता से जुडे रहे। मुक्तिबोध अपनी लम्बी कविताओं के लिए प्रसिध्द हैं। इनकी कविता में जीवन के प्रति विषाद और आक्रोश है। मुख्य संग्रह हैं : 'चांद का मुंह टेढा है तथा 'भूरी-भूरी खाक धूल। ये काव्य में नए स्वर के प्रवर्तक तथा मौलिक चिंतक हैं। इन्होंने निबंध, कहानियां तथा समीक्षाएं भी लिखी हैं। समस्त रचनाएं 'मुक्तिबोध रचनावली (6 खण्ड) में प्रकाशित हैं।

मुझे कदम-कदम पर

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बांहें फैलाए!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने....
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य पीडा है,
पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी!
बेवकूफ बनने की खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह देख-देख बडा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ...
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है
हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत.... स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियां लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहां जरा खडे होकर
बातें कुछ करता हूँ
.... उपन्यास मिल जाते ।

विचार आते हैं

विचार आते हैं-
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय
चांद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में।
विचार आते हैं
लिखते समय नहीं,
.... पत्थर ढोते वक्त,
पीठ पर उठाते वक्त बोझ
सांप मारते समय पिछवाडे
बच्चों की नेकर फटीचते वक्त!
पत्थर पहाड बन जाते हैं
नक्शे बनते हैं भौगोलिक
पीठ कच्छप बन जाते हैं
समय पृथिवी बन जाता है..
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