हिन्दी के कवि

गोपालशरण सिंह

(1891-1960 ई.)

गोपालशरण सिंह का जन्म रीवा राज्य के नयीगढी इलाके के एक जमींदार के घराने में हुआ। शिक्षा रीवा एवं प्रयाग में हुई। ये प्रयाग, इंदौर और रीवा के अनेक साहित्यिक संस्थानों से संबध्द थे। इनके मुक्तक संग्रह 'माधवी, 'सुमना, 'सागरिका और 'संचिता हैं। 'कादम्बिनी तथा 'मानवी गीत-काव्य हैं। इनकी काव्य भाषा शुध्द, सहज एवं साहित्यिक है।

अचरज

मैंने कभी सोचा, वह मंजुल मयंक में है,
देखता इसीसे उसे, चाव से चकोर है।
कभी यह ज्ञात हुआ, वह जलधर में है,
नाचता निहार के, उसीको मंजु मोर है।
कभी यह हुआ अनुमान, वह फूल में है,
दौडकर जाता, भृंग-वृंद जिस ओर है।
कैसा अचरज है, न मैंने जान पाया कभी,
मेरे चित में ही छिपा, मेरा चितचोर है॥

ब्रज वर्णन

आते जो यहां हैं, ब्रज भूमि की छटा वे देख,
नेक न अघाते, होते मोद-मद-माते हैं।
जिस ओर जाते, उस ओर मन भाते दृश्य,
लोचन लुभाते और चित्त को चुराते हैं।
पल भर अपने को भूल जाते हैं वे सदा,
सुखद अतीत-सुधा-सिंधु में समाते हैं।
जान पडता है उन्हें आज भी कन्हैया यहां,
मैया मैया टेरते हैं, गैया को चराते हैं॥
करते निवास छवि-धाम, घनश्याम-भृंग,
उर कलियों में सदा, ब्रज नर-नारी की।
कण-कण में है यहां, व्याप्त दृग सुखकारी,
मंजु मनोहारी मूर्ति, जुगल मुरारी की।
किसको नहीं है सुध, आती अनायास यहां,
गोवर्धन देखकर, गोवर्धन-धारी की?
न्यारी तीन लोक से है, प्यारी जन्मूभूमि यही,
जन मनहारी वृंदा-विपिन बिहारी की॥

 

 

 

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