हिन्दी के कवि

हित वृंदावनदास

(1695-1793)

हित वृंदावनदास का जीवन वृत्तांत उपलब्ध नहीं है। अनुमान है कि ये पुष्कर के निवासी थे जो बाल्य-काल में ही विरक्त होकर वृंदावन जाकर रहने लगे थे। वल्लभ संप्रदाय के कवियों में इनका प्रमुख स्थान है। कहते हैं सूरदास की भांति इन्होंने भी सवा लाख पद रचे थे, जिनमें दोहा, चौपाई, छप्पय आदि कई प्रकार के छंदों का प्रणयन किया था। लोक जीवन से जुडे हुए संस्कारों, त्योहारों और रासलीला आदि पर भी इन्होंने गीत लिखे। 'लाड-सागर इनका प्रसिध्द ग्रंथ है। ब्रजभाषा को व्यापक बनाने में इनका योगदान आदरणीय है।

पद

प्रीतम तुम मो दृगन बसत हौ।
कहा भरोसे ह्वै पूछत हौ, कै चतुराई करि जु हंसत हौ॥

लीजै परखि सरूप आपनो, पुतरिन मैं तुमहीं जु लसत हौ।
'वृंदावन हित रूप, रसिक तुम, कुंज लडावत हिय हुलसत हौ॥

ठाडी रह री लाड गहेली मैं माला सुरझाऊं।
नक बेसर की ग्रंथि जो ढीली, ता सुभग बनाऊं॥

ऐरी टेढी चाल छांडि मैं सूधी चलनि सिखाऊं।
'वृंदावन हित रूप फूल की, माल रीझ जो पाऊं॥

मिठ बोलनी नवल मनिहारी।
मौहैं गोल गरूर हैं, याके नयन चुटीले भारी॥

चूरी लखि मुख तें कहै, घूंघट में मुसकाति।
ससि मनु बदरी ओट तें, दुरि दरसत यहि भांति॥

चूरो बडो है मोल को, नगर न गाहक कोय।
मो फेरी खाली परी, आई सब घर टोय॥

 

 

 

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