हिन्दी के कवि

मलिक मुहम्मद जायसी

(1495 ई. अनुमानित)

जायसी निर्गुण धारा के प्रेमाश्रयी संत और कवि हैं। रायबरेली के जायस नामक स्थान के निवासी होने के कारण इन्हें 'जयासी कहा गया। ये अमेठी के राज दरबार में रहते थे जहाँ इनका अच्छा सम्मान था। जायसी के दर्जनों ग्रंथ बताए जाते हैं, जिनमें 'पद्मावत, 'अखरावट तथा 'आखिरी कलाम प्रमुख हैं। प्रेमाख्यान परंपरा में अवधी भाषा में लिखा गया 'पद्मावत हिंदी-साहित्य का एक अमूल्य रत्न है। इसमें शृंगार के दोनों पक्षों (संयोग और वियोग)) का चरम उत्कर्ष मिलता है। राजा रत्नसेन की पहली रानी नागमती का वियोग तथा दूसरी रानी पद्मावती का संयोग वर्णन साहित्य में बेजोड है। आगे आने वाले कवियों ने निश्चय ही इसके उपमा, रूपक आदि से बहुत कुछ लिया है। भाषा, भाव, अलंकार आदि श्रेष्ठ कविता के समस्त गुण इसमें विद्यमान हैं।

नागमती वियोग खंड (बारहमासा)

अगहन दिवस घटा, निसि बाढी। दूभर, रैनि जाइ किमि काढी॥
अब यहि बिरह दिवस भा राती। जरौं बिरह जस दीपक बाती॥
काँपै हिया जनावै सीऊ। तो पै जाइ होइ सँग पीऊ॥
घर-घर चीर रचे सब का। मोर रूप रंग लेइगा ना॥
पलटि न बहुरा गा जो बिछाई। अबँ फिरै, फिरै रँग सोई॥
बज्र-अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलुगि-सुलुगि दगधै होइ छारा॥
यह दु:ख-दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै भसमंतू॥
पिउ सों कहेहु संदेसडा, हे भौरा! हे काग!
जो घनि बिरहै जरि मुई, तेहिक धुवाँ हम्ह लाग॥

पूस जाड थर-थर तन काँपा। सूरुज जाइ लंकदिसि चाँपा॥
बिरह बाढ, दारुन भा सीऊ । कँपि-कँपि मरौं, लेइ-हरि जीऊ ॥
कंत कहा लागौ ओहि हियरे। पंथ अपार, सूझ नहिं नियरे॥
सौंर सपेती आवै जूडी। जानहु सेज हिवंचल बूडी॥
चकई निसि बिछुरै, दिन मिला। हौं दिन रात बिरह कोकिला॥
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसे जियै बिछोही पँखी॥
बिरह सचान भयउ तन जाडा। जियत खाइ और मुए न छाँडा॥
रकत ढुरा माँसू गरा, हाड भएउ सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आई समेटहु पंख॥

लागेउ माघ परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड काला॥
पहल-पहल तन रुई जो झाँपै। हहरि-हहरि अधिकौ हिय काँपै॥
नैन चुवहिं जस माहुटनीरू। तेहि जल अंग लाग सर-चीरू॥
टप-टप बूँद परहिं जस ओला। बिरह पवन होई मारै झोला॥
केहिक सिंगार, को पहिरु पटोरा? गीउ न हार, रही होई होरा॥
तुम बिनु काँपौ धनि हिया, तन तिनउर-भा डोल।
तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उडावा झोल॥

फागुन पवन झकोरा बहा। चौगुन सीउ जाई नहिं सहा॥
तन जस पियर पात भा मोरा। तेहि पर बिरह देइ झझकोरा॥
परिवर झरहि, झरहिं बन ढाँखा। भई ओनंत फूलि फरि साखा॥
करहिं बनसपति हिये हुलासू। मो कह भा जग दून उदासू।

फागु करहिं सब चाँचरि जोरी। मोहि तन लाइ दीन्हि जस होरी॥
जौ पै पीउ जरत अस पावा। जरत मरत मोहिं रोष न आवा॥
राति-दिवस बस यह जिउ मोरे। लगौं निहोर कंत अब तोरे॥
यह तन जारौं छार कै, कहौ कि 'पवन उडाउ।
मकु तेहि मारग उडि पैरों, कंत धरैं जहँ पाँउ॥

 

 

 

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