हिन्दी के कवि

केदारनाथ अग्रवाल

(जन्म 1910 ई.)

केदारनाथ अग्रवाल का जन्म बांदा जिले के कमासिन ग्राम में हुआ। जीविका से वकील श्री अग्रवाल छायावादी युग के मूर्धन्य प्रगतिवादी कवि थे। अनूठा शब्दचयन और भावाभिव्यक्ति में चित्रात्मकता इनकी विशेषता है। 'युग की गंगा, 'नींद के बादल, 'लोक और आलोक, 'फूल नहीं रंग बोलते हैं, 'आग का आईना, 'गुलमेहंदी, 'पंख और पतवार, 'हे मेरी तुम और 'अपूर्वा इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं। इनके कई निबंध-संग्रह भी प्रकाशित हैं। ये साहित्य अकादमी तथा 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित हुए।

वीरांगना

मैंने उसको
जब-जब देखा
लोहा देखा
लोहे जैसा-
तपते देखा-
गलते देखा-
ढलते देखा
मैंने उसको
गोली जैसा
चलते देखा।

आज नदी बिलकुल उदास थी

आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोई थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर-
बादल का वस्त्र पडा था।
मैंने उसको नहीं जगाया,
दबे पांव घर वापस आया।

ओस की बूंद कहती है

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं
नव-गुलाब पर मन की बात।
कवि कहता है : मैं भी लिख दूं
प्रिय शब्दों में मन की बात॥
ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ
नव-गुलाब हो गया मलीन।
पर कवि ने लिख दिया ओस से
नव-गुलाब पर काव्य नवीन॥

 

 

 

 

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