हिन्दी के कवि

केदारनाथ सिंह

(जन्म 1932 ई.)

केदारनाथ सिंह का जन्म बलिया जिले के चकिया ग्राम में हुआ। शिक्षा पहले गांव में, फिर काशी में हुई। कई वर्षों तक पडरौना डिग्री कॉलेज का प्राचार्य पद संभालने के बाद 1976 से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। इन्होंने कविता के अतिरिक्त निबंध तथा आलोचनाएं भी लिखी हैं। इनके मुख्य काव्य संग्रह हैं : 'अभि बिलकुल अभी, 'जमीन पक रही है, 'यहां से देखो तथा 'अकाल में सारस। ये कुमारन आशान, साहित्य अकादमी, दयावती मोदी पुस्कार साहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं।

हक दो
फूल को हक दो, वह हवा को प्यार करे,
ओस, धूप, रंगों से जितना भर सके, भरे,
सिहरे, कांपे, उभरे,
और कभी किसी एक अंखुए की आहट पर
पंखुडी-पंखुडी सारी आयु नाप कर दे दे-
किसी एक अनदेखे-अनजाने क्षण को
नए फूलों के लिए!
गंध को हक दो वह उडे, बहे, घिरे, झरे, मिट जाए,
नई गंध के लिए!
बादल को हक दो- वह हर नन्हे पौधे को छांह दे, दुलारे,
फिर रेशे-रेशे में हल्की सुरधनु की पत्तियां लगा दे,
फिर कहीं भी, कहीं भी, गिरे, बरसे, घहरे, टूटे-
चुक जाए-
नए बादल के लिए!
डगर को हक दो- वह, कहीं भी, कहीं भी, किसी
वन, पर्वत, खेत, गली-गांव-चौहटे जाकर-
सौंप दे थकन अपनी,
बांहे अपनी-
नई डगर के लिए!
लहर को हक दो- वह कभी संग पुरवा के,
कभी साथ पछुवा के-
इस तट पर भी आए- उस तट पर भी जाए,
और किसी रेती पर सिर रख सो जाए
नई लहर के लिए!
व्यथा को हक दो- वह भी अपने दो नन्हे
कटे हुए डैनों पर,
आने वाले पावन भोर की किरन पहली
झेल कर बिखर जाए,
झर जाए-
नई व्यथा के लिए!
माटी को हक दो- वह भीजे, सरसे, फूटे, अंखुआए,
इन मेडों से लेकर उन मेडों तक छाए,
और कभी न हारे,
(यदि हारे)
तब भी उसके माथे पर हिले,
और हिले,
और उठती ही जाए-
यह दूब की पताका-
नए मानव के लिए!

शामें बेच दी हैं
शाम बेच दी है
भाई, शाम बेच दी है
मैंने शाम बेच दी है!

वो मिट्टी के दिन, वो धरौंदों की शाम,
वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,
मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,
वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम
वो दिनभर का पढना, वो भूलों की शाम,
वो वन-वन के बांसों-बबूलों की शाम,
झिडकियां पिता की, वो डांटों की शाम,
वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,
वो बांहों में नील आसमानों की शाम,
वो वक्ष तोड-तोड उठे गानों की शाम,
वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,
वो ढेरों दुआएं, वो लोरी की शाम,
वो बरगद पे बादल की पांतों की शाम
वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,
वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,
वो सपनों के घोडे, वो टापों की शाम,

वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

वो सडकों की शाम, बयाबानों की शाम,
वो टूटे रहे जीवन के मानों की शाम,
वो गुम्बद की ओट हुई झेपों की शाम,
हाट-बाटों की शाम, थकी खेपों की शाम,
तपी सांसों की तेज रक्तवाहों की शाम,
वो दुराहों-तिराहों-चौराहों की शाम,
भूख प्यासों की शाम, रुंधे कंठों की शाम,
लाख झंझट की शाम, लाख टंटों की शाम,
याद आने की शाम, भूल जाने की शाम,
वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम,
वो चेहरे पर उडते से भावों की शाम,
वो नस-नस में बढते तनावों की शाम,
वो कैफे के टेबल, वो प्यालों की शाम,
वो जेबों पर सिकुडन के तालों की शाम,
वो माथे पर सदियों के बोझों की शाम
वो भीडों में धडकन की खोजों की शाम,

वो तेज-तेज कदमों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

खोल दूं यह आज का दिन
खोल दूं यह आज का दिन
जिसे-
मेरी देहरी के पास कोई रख गया है,
एक हल्दी-रंगे
ताजे
दूर देशी पत्र-सा।
थरथराती रोशनी में,
हर संदेशे की तरह
यह एक भटका संदेश भी
अनपढा ही रह न जाए-
सोचता हूँ
खोल दूं।
इस सम्पुटित दिन के सुनहले पत्र-को
जो द्वार पर गुमसुम पडा है,
खोल दूं।

पर, एक नन्हा-सा
किलकता प्रश्न आकर
हाथ मेरा थाम लेता है,
कौन जाने क्या लिखा हो?
(कौन जाने अंधेरे में- दूसरे का पत्र मेरे द्वारा कोई रख गया हो)
कहीं तो लिखा नहीं है
नाम मेरा,
पता मेरा,
आह! कैसे खोल दूं।

हाथ,
जिसने द्वार खोला,
क्षितिज खोले
दिशाएं खोलीं,
न जाने क्यों इस महकते
मूक, हल्दी-रंगे, ताजे,
किरण-मुद्रित संदेशे को
खोलने में कांपता है।

पूंजी
सारा शहर छान डालने के बाद
मैं इस नतीजे पर पहुंचा
कि इस इतने बडे शहर में
मेरी सबसे बडी पूंजी है
मेरी चलती हुई सांस
मेरी छाती से बंद मेरी छोटी-सी पूंजी
जिसे रोज मैं थोडा-थोडा
खर्च कर देता हूँ

क्यों न ऐसा हो
कि एक दिन उठूं
और वह जो भूरा-भूरा-सा एक जन बैंक है
इस शहर के आखिरी छोर पर-
वहां जमा करा आऊं

सोचता हूँ
वहां से मिलेगा जो ब्याज
उस पर जी लूंगा ठाट से
कई-कई जीवन।

 

 

 

 

 

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