हिन्दी के कवि

केशवदास

(1559-1623 ई. अनुमानित)

केशवदास जाति के ब्राह्मण थे। पिता का नाम काशीनाथ था। केशव रीति-काव्य के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। इन्हें हिंदी तथा संस्कृत का बहुत अच्छा ज्ञान था। ये संगीत, धर्मशास्त्र, ज्योतिष एवं राजनीति के भी ज्ञाता थे। अपने जीवनकाल में इनको बहुत प्रसिध्दि मिली थी। इनके चार ग्रंथ प्रसिध्द हैं- 'रसिक प्रिया, 'कवि प्रिया, 'विज्ञान-गीता तथा 'राम चंद्रिका। 'राम चंद्रिका को 'छंदों का अजायबघर कहा गया है। केशव ने अपनी कविता द्वारा संस्कृत में निरूपित काव्य के विविध अंगों का संपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत किया है। इनका वृध्दावस्था पर लिखा एक दोहा प्रसिध्द है-

केसव केसनि अस करी, जस अरिहँ न कराहिं।
चंद्रबदनि मृगलोचनी, बाबा कहि कहि जाहिं॥

पद

प्रथम सकल सुचि मज्जन अमल बास,
जावक सुदेस केस-पास को सम्हारिबौ।

अंगराज भूषन बिबिध मुखबास-राग,
कज्जल कलित लोल लोचन निहारिबौ॥

बोलनि हँसनि मृदु चाकरी, चितौनि चारु,
पल प्रति पल पतिब्रत परिपालिबौ।

'केसोदास सबिलास करहु कुँवरि राधे,
इहि विधि सोरहै सिंगारनि सिंगारिबौ॥

'केशव सूधो विलोचन सूधी, विलोकनि कों अवलोकै सदाई।
सूधिये बात सुनै समुझे, कहि आवत सूधियै बात सुहाई॥

सूधी सी हाँसी सुधाकर, मुख सोधि लई वसुधा की सुधाई।
सूधे सुभाइ सबै सजनी, बस कैसे किए अति टेढे कन्हाई॥

'केसव चौंकति सी चितवै, छिति पाँ धरकै तरकै तकि छाँहीं।
बूझिये और कहै मुख और, सु और की और भई छिन माहीं॥

डीठि लगी किधौं बाइ लगी, मन भूलि परयो कै करयो कछु काहीं।
घूँघट की, घट की, पट की, हरि आजु कछू सुधि राधिकै नाहीं॥

 

 

 

 

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