हिन्दी के कवि

मैथिलीशरण गुप्त

(1886-1964 ई.)

साहित्य जगत में 'दद्दा नाम से प्रसिध्द राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झांसी के चिरगांव ग्राम में हुआ। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई। ये भारतीय संस्कृति एवं वैष्णव परंपरा के प्रतिनिधि कवि हैं, जिन्होंने पचास वर्षों तक निरंतर काव्य सर्जना की। लगभग 40 ग्रंथ रचे तथा खडी बोली को सरल, प्रवाहमय और सशक्त बनाया। इनकी मुख्य काव्य-कृतियां हैं- 'भारत-भारती, 'साकेत, 'यशोधरा, 'कुणाल-गीत, 'जयद्रथ-वध, 'द्वापर, 'पंचवटी तथा 'जय भारत। 'साकेत पर इन्हें 'मंगला प्रसाद पारितोषिक मिला था। ये 'पद्म-भूषण के अलंकरण से सम्मानित हुए। 1952 से 1964 तक ये राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।

मातृभूमि

नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुंदर हैं,
सूर्य चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर हैं।
नदियां प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडल हैं,
बंदीजन खग-वृंद शेष-फन सिंहासन हैं।
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की,
हे मातृभूमि, तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की।
जिसकी रज में लोट-लोटकर बडे हुए हैं,
घुटनों के बल सरक-सरक कर खडे हुए हैं।
परमहंस-सम बाल्यकाल में सब सुख पाए,
जिसके कारण 'धूलि भरे हीरे कहलाए।
हम खेले-कूदे हर्षयुत जिसकी प्यारी गोद में,
हे मातृभूमि, तुझको निरख मग्न क्यों न हों मोद में?
पाकर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा,
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है,
बस, तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है।
फिर अंत समय तू ही इसे, अचल देख अपनायगी,
हे मातृभूमि, यह अंत में, तुझमें ही मिल जाएगी।
क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है,
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है।
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुखहर्त्री है,
भय-निवारिणी, शांतिकारिणी, सुखकर्त्री है।
हे शरणदायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है,
हे मातृभूमि, संतान हम, तू जननी, तू प्राण है।
जिस पृथिवी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे,
उससे हे भगवान्! कभी हम रहें न न्यारे।
लोट-लोटकर वहीं हृदय को शांत करेंगे,
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे।
उस मातृभूमि की धूलि में जब पूरे सन जायंगे,
होकर भाव-बंधन-मुक्त हम आत्मरूप बन जायंगे।

रात्रि वर्णन

चारु चंद्र की चंचल किरणें
खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है
अवनि और अंबर तल में।
पुलक प्रगट करती है धरती
हरित तृणों की नोकों से,
मानो झूम रहे हैं तरु भी
मंद पवन के झोंकों से॥
क्या ही स्वच्छ चांदनी है यह
है क्या ही निस्तब्ध निशा,
है स्वच्छंद-सुमंद गंध वह,
निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं
नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकांत भाव से,
कितने शांत और चुपचाप॥
है बिखेर देती वसुंधरा
मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको
सदा सबेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी
संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम तनु जिससे उसका-
नया रूप छलकाता है॥
पंचवटी की छाया में है
सुंदर पर्ण कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर
धीर वीर निर्भीक-मना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जबकि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी सा
बना दृष्टिगत होता है।

 

 

 

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