हिन्दी के कवि

मीराबाई

(1498-1563 ई. अनुमानित)

मीराबाई जोधपुर के राव जोधाजी के पुत्र रत्नसिंह की इकलौती संतान थीं। इनका विवाह मेवाड के राणा साँगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज से हुआ था। विवाह के 10 वर्ष बाद ही ये विधवा हो गईं। मीरा बचपन से ही कृष्ण-भक्त थीं। कहते हैं बचपन में इन्होंने एक साधु से गिरिधर की एक प्रतिमा ले ली थी तथा मन ही मन उसे ही पति मान लिया था। राणा भोजराज की मृत्यु के पश्चात मीरा भगवत् भजन और साधु-संतों की संगत में जीवन बिताने लगीं। उनके देवर विक्रमाजीत सिंह इसे सहन न कर सके। उन्होंने छल द्वारा मीरा को मारने के अनेक प्रयत्न किए किंतु हर बार प्रभु ने इनकी रक्षा की। अंत में विरक्त होकर मीरा पहले वृंदावन तथा अंत में द्वारिका चली गईं तथा वहीं मंदिर की सीढियों पर मीरा का प्राणांत हो गया। विद्यापति तथा सूरदास की भाँति हिन्दी के गीति-काव्य साहित्य में मीरा का बहुत बडा योगदान है। मीरा के भजन संपूर्ण भारत में प्रचलित हैं। इनकी भाषा राजस्थानी, गुजराती तथा ब्रजभाषा मिश्रित है। इनकी सात-आठ कृतियाँ बताई जाती हैं। भक्ति, दैन्य, प्रेम की आकुलता तथा तन्मयता ने मीरा को कवयित्री बना दिया। हिन्दी में मीरा एवं महादेवी पीडा की कवयित्रियाँ कही जाती हैं।

पद

नैना निपट बंकट छबि अटके।

देखत रूप मदनमोहन को, पियत पियूख न मटके।

बारिज भवाँ अलक टेढी मनौ, अति सुगंध रस अटके॥

टेढी कटि, टेढी कर मुरली, टेढी पाग लट लटके।

'मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरिधर नागर नट के॥

 

हरि तुम हरो जन की भीर।

द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढायो चीर॥

भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप शरीर।

हिरणकश्यपु मार दीन्हों, धरयो नाहिंन धीर॥

बूडते गजराज राखे, कियो बाहर नीर।

दासि 'मीरा लाल गिरिधर, दु:ख जहाँ तहँ पीर॥

 

दरस बिन दूखण लागे नैन।

जबसे तुम बिछुडे प्रभु मोरे कबहुँ न पायो चैन॥

सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपै मीठे लागे बैन।

बिरह कथा कासूँ क सजनी बह गई करवत ऐन॥

कल न परत पल-पल मग जोवत भई छमासी रैन।

'मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे दु:ख मेटण सुख दैन॥

 

मन रे परस हरि के चरन

सुभग सीतल कमल कोमल, त्रिबिध ज्वाला हरन।

जे चरन प्रहलाद परसे, इंद्र पदवी धरन॥

जिन चरन ध्रुव अटल कीन्हों, राखि अपने सरन।

जिन चरन ब्रह्माण्ड भेंटयो, नख सिखौ श्री भरन॥

जिन चरन प्रभु परसि लीने, तरी गौतम घरन।

जिन चरन कालीहिं नाथ्यो, गोप लीला करन॥

जिन चरन धारयो गोबर्धन, गरब मघवा हरन।

दासि 'मीरा लाल गिरिधर, अगम तारन तरन॥

 

पग घुँघुरू बाँध मीरा नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की आपहिं हो गई दासी रे।

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥

बिषका प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।

'मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

 

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।

जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई।

तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥

छाँडि दई कुल की कानि कहा करिहै कोई।

संतन ढिंग बैठि-बैठि लोक लाज खोई।

चुनरी के किये टूक ओढ लीन्हीं लोई।

मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥

ऍंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।

अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥

दूध की मथनिया बडे प्रेम से बिलोई।

माखन जब काढि लियो छाछ पिये कोई॥

भगत देखि राजी हुई जगत देखि रोई।

दासी 'मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोही॥

 

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो॥

वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा करि अपनायो॥

जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।

खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढत सवायो॥

सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।

'मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो॥

 

 

 

 

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