हिन्दी के कवि

नरेन्द्र शर्मा

(1913-1989 ई.)

नरेन्द्र शर्मा का जन्म बुलंदशहर के जहाँगीरपुर गाँव में हुआ। इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। तदनंतर वर्षों तक आकाशवाणी से सम्बध्द रहे। फिल्मों के गीत भी लिखे। ये सुकुमार भावनाओं के कवि हैं। मुख्य काव्य-संग्रह हैं- 'शूल-फूल, 'प्रभात-फेरी, 'प्रवासी के गीत, 'कदली वन, 'मिट्टी और फूल, रक्त-चंदन, 'मनोकामिनी तथा 'अग्नि शस्य। 'द्रौपदी इनका खंड काव्य है। इनके प्रकृति वर्णनों में चित्रमयता है।

सूरज डूब गया बल्ली भर

सूरज डूब गया बल्ली भर-
सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उठ आया है-
चाँद, ताड के जंगल में।
अगणित उँगली खोल, ताड के पत्र, चाँदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड का जंगल सोया रजत-छत्र खोले
कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।
बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज-गरज कर कुछ कहता,
शशि बनकर मन चढा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु तल में।
परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चाँद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू-रज
मन को खेल खिलाता कोई,
निशि दिन के छाया-छल में।

मेरा मन

मेरा चंचल मन भी कैसा, पल में खिलता, मुरझा जाता!
जब सुखी हुआ सुख से विह्वल, जब दु:खी हुआ दु:ख से बेकल,
वह हरसिंगार के फूलों सा सुकुमार सहज कुम्हला जाता!
फूला न समाता खुश होकर, या घर भर देता रो-रोकर,
या तो कहता, 'दुनिया मेरी, या 'जग से मेरा क्या नाता!
मेरे मन की यह दुर्बलता, सामान्य नहीं निज को गिनता,
वह अहंकार से उपजा है, इसलिए सदा रोता-गाता!
मैंने बहुतेरा समझाया, मन अब तक समझ नहीं पाया,
वह भी मिट्टी से ही निकला, फिर मिट्टी ही में मिल जाता!

 

 

 

 

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