हिन्दी के कवि

नरोत्तमदास

(1493-1545 ई. अनुमानित)

नरोत्तमदास के जीवन के विषय में कुछ विशेष ज्ञात नहीं है। शिवसिंह 'सरोज से पता चलता है कि ये बाडी नामक स्थान के रहने वाले कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके ग्रंथों में एक 'सुदामा चरित ही उपलब्ध है, यद्यपि कहा जाता है कि इन्होंने 'ध्रुव चरित तथा 'विचारमाला ग्रंथ भी रचे थे। सुदामा चरित अत्यंत सरस, सरल, स्वाभाविक एवं भक्ति-भाव परिपूर्ण एक रोचक खंड-काव्य है। इसी ग्रंथ के बल पर नरोत्तमदास अक्षय कीर्ति के भागी हुए हैं।

सुदामा चरित

कह्यो सुदामा एक दिन कृस्न हमारे मित्र।
करति रहति उपदेस तिय, ऐसो परम विचित्र॥
लोचन कमल दुख-मोचन तिलक भाल,
स्रवननि कुंडल मुकुट धरे माथ हैं।
ओढे पीत बसन गरे में बैजयंती माल,
शंख चक्र गदा और पद्म लिए हाथ हैं।
कहत 'नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास,
तुमही कहत हम पढे एक साथ हैं।
द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे प्रिय,
द्वारिका के नाथ वे अनाथन के नाथ हैं॥

सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय ताको कहा अब देति है सिच्छा।
जो तप कै परलोक सुधारत, सम्पति की तिनके नहिं इच्छा॥
मेरे हिये हरि के पद पंकज, बार हजार लै देखु परिच्छा।
औरनि को धन चाहिए बावरि, बाँभन को धन केवल भिच्छा॥

दानी बडे तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै।
दीनन की सुधि लेत भली बिधि, सिध्द करौ पिय मेरौ मतौ ले॥
दीनदयाल के द्वारा न जात सो और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै।
श्री जदुनाथ से जाके हितू सो तिँ-पन क्यों कन माँगत डोलै॥

कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मठौती।
सीत बितीतत जो सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हैं न हठौती॥
जो जनती न हितू हरि सों, तौ मैं काहे को द्वारिका ठेलि पठौती।
या घरतें कबँ न गयो पिय टूटो तवा अरु फूटी कठौती॥

छाँडि सबै झक तोहि लगी बक, आठहु जाम यहै हठ ठानी।
जातहिं दैहैं लदाय लढा भरि, लैहौं लदाय यहै जिय जानी॥
पैहैं कहाँ ते अटारी अटा, जिनके बिधि दीन्हीं हैं टूटी सी छानी।
जो पै दरिद्र लिखो है ललाट, तो काहू पै मेटि जात अजानी॥

ुजै कनावडो बार हजार लौं, जो हितू दीन दयाल सो पाइए।
तीनहुँ लोक के ठाकुर जे, तिनके दरबार गए न लजाइए॥
मेरी कही जिय में धरिकै पिय, भूलि न और प्रसंग चलाइए।
और के द्वार सों काज कहा पिय, द्वारिकानाथ के द्वारे सिधारिए॥

द्वारिका जाहु जू, द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै झक तेरे।
जो न कह्यो करिये तौ बडो दु:ख, जैये कहाँ अपनी गति हेरे॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया, तहँ भूपति जान न पावत नेरे।
पाँच सुपारी तैं देखु बिचारिकै, भेंट को चारि न चाउर मेरे॥

सीस पगा न झ्रगा तन में, प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह की नहिं सामा॥
द्वार खडो द्विज दुर्बल देखि रह्यो चकि सो वसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥

ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
'हाय महाुख पायो सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सो पग धोए॥

 

 

 

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