हिन्दी के कवि

प्रभाकर माचवे

(जन्म 1917-1991 ई.)

प्रभाकर माचवे का जन्म ग्वालियर में तथा शिक्षा इंदौर में और आगरा में हुई। इन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. एवं साहित्य वाचस्पति की उपाधियां प्राप्त कीं। ये मजदूर संघ, आकाशवाणी, साहित्य आकदमी, भारतीय भाषा परिषद् आदि से सम्बध्द रहे। देश और विदेश में अध्यापन किया। इनके कविता-संग्रह हैं : 'स्वप्न भंग, 'अनुक्षण, 'तेल की पकौडियां तथा 'विश्वकर्मा आदि। इन्होंने उपन्यास, निबंध, समालोचना, अनुवाद आदि मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी में 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इन्हें 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा उ.प्र. हिन्दी संस्थान का सम्मान प्राप्त हुआ है।

अ-परंपरित

चंद, तुम भाट थे, तुलसी तुम भक्त
भूषण, तुम चारण थे, कबिरा अनासक्त
भारतेंदु दानी थे, रईस थे
पंत और निराला उन्नीस-बीस थे
माखनलाल, गुप्तबंधु राष्ट्र का सहारा था
बेचारा मुक्तिबोध खोया आत्महारा था
प्रसाद और अज्ञेय
महादेवी अनुपमेय
इस दिव्य परंपरा में मैं मिट्टी का दिया हूँ
जैसा कुछ उसने दिया उसी पर जिया हूँ
सत्ता या, संस्था में,
श्री में, व्यवस्था में
मेरा विश्वास नहीं, कहीं भी न बंधा मैं
इसीलिए मन का स्वर कहीं नहीं सधा मैं
गंगा की हुगली तक
परंपरा जलधी तक
वेद से विनोबा तक कौन-सी है धारा?
बुध्द और नानक को, किस नाम से पुकारा?
मैं हूँ एक सिकता-कण
जिससे काल का गणन
मैंने कब पहचाना कौन-सा प्रवाह है
जाना सिर्फ अंतर्दाह, दुख पर जो पसीजेआप इसे कहते हों कविता तो कह लीजे
खीझें या रीझें आप, मेरी ये ही चीजें।

 

 

 

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