हिन्दी के कवि

राय कृष्णदास

(1892-1980 ई.)

राय कृष्णदास का जन्म वाराणसी में हुआ। ये राजा पटनीमल के वंशज थे। 'राय की उपाधि इनकी आनुवंशिक थी जो मुगल दरबार से मिली थी। इनकी भारतीय चित्रकला तथा मूर्तिकला में विशेष रुचि थी। ये 'भारत कला भवन के संस्थापक तथा 'भारती भंडार (साहित्य-प्रकाशन संस्थान) के संपादक थे। ये कलाविद् ही नहीं अनेक कलाकारों के आश्रयदाता भी थे। हिंदी के अनेक प्रसिध्द साहित्यकारों को प्रकाश में लाने और प्रोत्साहित करने का श्रेय इन्हें जाता है। ये कहानी लेखक, गद्यगीतकार तथा कवि थे। उपनाम था 'नेही। ब्रजभाषा में लिखे इनके फुटकर छंदों में मानवीय भावनाओं का कोमल और भावुक पक्ष परिलक्षित है।

पद

छहरि रही है कं, लहरि रही है कं,
रपटि परै त्यों कं सरपट धावै है।
उझकै कं, त्यों कं झिझकि ठिठकि जात,
स्यामता बिलोकि रोरी-मूंठनि चलावै है॥

कौंलन जगाइ, नीके रंग में डुबाइ, भौंर-
भीर को गवाइ, कितो रस बरसावै है।
केसर की माठ भरे, कर पिचकारी धरे,
पूरब-सुबाला होरी भोर ही मचावै है॥

पंछी जग केते दई दई जिन्हें रूप रासि,
सुरह दिए हैं हठि हियो जौन छोरि लेत।
भावै पै न मोहिं कोऊ इतो जितो चातक, जो
अपनी पुकार में ही आपुनो दरस देत॥

आज लौं न देख्यो जाहि कैसो रूप कैसो रंग,
है अराल कै कराल, जाने किधौं स्याम सेत।
पूरन पढी पै जानै पाटी प्रेम की पुनीत,
जानत जो री कैसें जात हैं निबाह्यो हेत॥

दोहे

कत अचरज! सर प्रेम के, डूबि सकैं नहिं सोइ।
भारी बोझो लाज को, जिनके माथे होइ॥

सीस अलक, दृग पूतरी, त्यों कपोल तिल पाइ।
मिटी स्यामता-साध नहिं, गुदनो लियो गुदाइ॥

अपुनो मोहन रूप जो, तुमहिं निरखिबो होय।
इन नैनन में आई कै, नैकु लेहु पिय! जोय॥

पंचाली को पट जथा, खींचे बाढयो और।
सुरझाएं अरुझात अरु, नैना वाही तौर॥

रूप-कनी इन चखनि गडि, जखम करति भरपूर।
कसकि कसकि जिय लेति है, कबं होति न दूर॥

नासा मोरि, कराहि कै, अंगनि भौंहीन ऎठि।
कांटो नाहिं काढन दियो, कांटे-सी हिय पैठि॥

बंसी! कर न गरूर हरि, धरत अधर हर-जाम।
अधरन लाए रहत , रटत हमारोइ नाम॥

 

 

 

 

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