हिन्दी के कवि

रमेशचंद्र शाह

(जन्म 1937 ई.)

रमेशचंद्र शाह  का जन्म अल्मोडा में हुआ। ये कवि होने के साथ-साथ उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार तथा कुशल समालोचक भी हैं। इनके कविता-संग्रह है : 'कछुए की पीठ पर तथा 'हरिश्चन्द्र आओ। 'गोबर गणेश और 'किस्सा-ए-गुलाम इनके चर्चित उपन्यास हैं। 'छायावाद की प्रासंगिकता इनका आलोचनात्मक ग्रंथ है।

वत्सल दृष्टि
आंखें मलते हुए
पहाड उठे
अलसाए...
चीडों ने करवट बदली।
किरणों ने लुके-छिपे
शिखरों की समिधा छू उकसा दी
पल में निर्धूम पीत-रक्तिम शिखाओं में
सुलग उठीं क्षितिज-वेदिकाएं
नियराती सुबह की प्रतिध्वनियां
सुनती प्रतीक्षामय
ध्यानमग्न अंतर्मुख धरा
और भूमिष्ठ, अर्चनाकुल आकाश...

सूर्योदय! ... किरण-फूल
प्राची की अंजुरी बिखरी
शीश उठा विहंसा व्योम
धरती उजलाई
झूम उठी चिडों की सघन पांत
स्वागत-ॠचाओं में
कूज उठे नीडों के
आरण्यक
सूर्योदयी प्रकृति का प्रार्थना-तरंगित मौन
निहारती मन्द:स्मित अपलक
हिमालय की वत्सल
ॠषि-दृष्टि

***
एक अकस्मात्
ताजी ककडी की
नहीं-रायते की गंध ने
सहसा चिल्लाकर कहा
मां!...
और मैंने
छत की सूराख से
रसोईघर में झांककर
धुएं में लिपटा तुम्हारा मुख चीन्हा
और चिल्लाकर कहा-
मां!...
तुमने नहीं देखा
तुमने नहीं सुना
तुम जैसे आई थीं
वैसे ही चली गईं

पर जैसे कैसे क्या हुआ
कि मुझे मेरी मातृभाषा
याद आ गई
और मैं तुतलाने लगा...
तुम्हारा नाम कवच था
कल्पवृक्ष था। काव्य था।
मैं था। संसार था। प्यार था।
जनम-कैद यह
तुमने नहीं जनी थी
यह मेरी कमाई है
मेरी कमाई मेरे साथ है
और तुम
कहां हो मां!
कहां हो?

मेरी डायरी में
नहीं है दर्ज तारीख वह
जहां से मैंने तुम्हें
पहचानना
बंद किया था।
**
अतिथि
हवा के झोंके-सा
आया वह
आने के साथ ही
रो-गया अपना दुख

न मैंने कुछ पूछा
न उसने कुछ कहा।
जी भर रो लेने के बाद

वह
चला गया।

धीरे-धीरे
मेरी समझ में आया

कि मैं, जो कभी नहीं
हो सका अकेला अपने साथ

उसका
एकान्त
था।

 

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