हिन्दी के कवि

रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'

(जन्म 1915 ई.)

रामेश्वर शुक्ल 'अंचल का जन्म फतेहपुर जिले के किशनपुर ग्राम में हुआ। जबलपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में वर्षों तक अध्यापन किया तथा विभागाध्यक्ष रहे। ये छायावाद युग के उत्तरार्ध के कवि हैं। बाद में इन्होंने मार्क्सवादी तथा प्रगतिशील कविताएं भी लिखीं। इनकी भाषा में नए विशेषण और नए उपमान प्रयुक्त हुए हैं। मुख्य कविता-संग्रह हैं : 'मधुलिका, 'अपराजिता, 'किरण बेला, 'वर्षांत के बादल और 'विराम चिन्ह। इन्होंने उपन्यास, निबंध तथा हिन्दी साहित्य का अनुशीलन आदि ग्रंथ भी लिखे।

स्वप्न और सत्य

स्वप्न है संसार, तो किस सत्य के कवि गीत गाए
तोडकर अपना हृदय किस सत्य की प्रतिमा बनाए?
कौन-सा वह! कौन-सा सुख, फूल को जो फल बनाता,
दूज का क्यों चांद दौडा पूर्णिमा की ओर जाता?
जागती पिक की कुहुक से प्राण में कैसी कहानी,
रूप स्वप्नातीत किसका रात कर देता सुहानी?
गंध से आतुर समीरण, ज्योति से उमडे सितारे,
स्नेह से फैली नदी, सौंदर्य से जकडे किनारे,
लोच भर देती हवा में खेतियां क्यों लहलहातीं,
जान पड जाती किरण में सुन खगों की क्यों प्रभाती?
स्वप्न हैं ये सब अगर, किस सत्य के कवि गीत गाए
कौन सुषमा से बडा संदेश मानव को सुनाए?

भूलने में सुख मिले तो भूल जाना

भूलने में सुख मिले तो भूल जाना।
एक सपना-सा समझना ज्यों नदी में बाढ आना
भूलने में सुख मिले तो भूल जाना।
थीं सुनी तुमने बहुत-सी जो लडकपन में कहानी
शेष जिनकी सुधि नहीं- मैं था उन्हीं का एक प्राणी!
सोच लेना- था किसी अनजान पंछी का तराना।
झूमते लय-भार से जिस राग के मिजराब सारे
भूल जाते वे उसे तत्क्षण- गगन ज्यों भग्न तारे
ठीक वैसे तुम मुझे यदि सुख मिले तो भूल जाना।
भूल जाती गंध अपना कुंज जाती दूर जब उड
भूल जाते प्राण काया छोडते ही शून्य में मुड
हो कभी विह्वल न मेरी याद में भर अश्रु लाना।
भूल जाता फूल डाली को क्षणों में ही बिछुड कर
याद मेघों को न करती दामिनी भी आ धरा पर
बढ गया जो दीप उसमें अब न तुम बाती सजाना।
वेदना इससे बडी होगी मुझे क्या और सुनकर
तुम विकल हो याद करती हो मुझे चीत्कार-कातर
क्यों उठे, मेरा वही फिर दर्द छाती का पुराना
भूलने में सुख मिले तो भूल जाना।

 

 

 

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