हिन्दी के कवि

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

(1927-1983 ई.)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म बस्ती जिले के एक गांव में हुआ। उच्च शिक्षा काशी में हुई। पहले अध्यापन किया, फिर आकाशवाणी से जुडे। बाद में 'दिनमान के सहायक सम्पादक बने। ये 'तीसरा सप्तक के कवियों में प्रमुख हैं। इनकी रचनाएं रूसी, जर्मन, पोलिश तथा चेक भाषाओं में अनूदित हैं। इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं : 'काठ की घंटियां, 'बांस का पुल, 'गर्म हवाएं, 'कुआनो नदी, 'जंगल का दर्द, 'एक सूनी नाव, 'खूंटियों पर टंगे लोग तथा 'कोई मेरे साथ चले। इन्होंने उपन्यास, कहानी, गीत-नाटिका तथा बाल-काव्य भी लिखे हैं। ये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं।

खाली समय में
खाली समय में,
बैठ कर ब्लेड से नाखून काटें,
बढी हुई दाढी में बालों के बीच की
खाली जगह छांटे,
सर खुजलाएं, जम्हुआए,
कभी धूप में आए,
कभी छांह में जाए,
इधर-उधर लेटें,
हाथ-पैर फैलाएं,
करवटें बदलें
दाएं-बाएं,
खाली कागज पर कलम से
भोंडी नाक, गोल आंख, टेढे मुंह
की तसवीरें खींचें
बार-बार आंखें खोले
बार-बार मींचें,
खांसें, खंखारें,
थोडा बहुत गुनगुनाएं,
भोंडी आवाज में,
अखबार की खबरें गाए,
तरह-तरह की आवाज
गले से निकालें,
अपनी हथेली की रेखाएं
देखें-भालें,
गालियां दे-दे कर मक्खियां उडाएं,
आंगन के कौओं को भाषण पिलाए,
कुत्ते के पिल्ले से हाल-चाल पूछें,
चित्रों में लडकियों की बनाएं मूंछे,
धूप पर राय दें, हवा की वकालत करें,
दुमड-दुमड तकिए की जो कहिए हालत करें,
खाली समय में भी बहुत से काम है
किस्मत में भला कहां लिखा आराम है!

ईश्वर
बहुत बडी जेबों वाला कोट पहने
ईश्वर मेरे पास आया था,
मेरी मां, मेरे पिता,
मेरे बच्चे और मेरी पत्नी को
खिलौनों की तरह,
जेब में डालकर चला गया
और कहा गया,
बहुत बडी दुनिया है
तुम्हारे मन बहलाने के लिए।
मैंने सुना है,
उसने कहीं खोल रक्खी है
खिलौनों की दुकान,
अभागे के पास
कितनी जरा-सी पूंजी है
रोजगार चलाने के लिए।

जब-जब सिर उठाया
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।
मस्तक पर लगी चोट,
मन में उठी कचोट,

अपनी ही भूल पर मैं,
बार-बार पछताया।
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

दरवाजे घट गए या
मैं ही बडा हो गया,
दर्द के क्षणों मेंकुछ
समझ नहीं पाया।
जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

'शीश झुका आओ बोला
बाहर का आसमान,
'शीश झुका आओ बोली
भीतर की दीवारें,
दोनों ने ही मुझे
छोटा करना चाहा,
बुरा किया मैंने जो
यह घर बनाया।

जब-जब सिर उठाया
अपनी चौखट से टकराया।

 

 

 

 

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