हिन्दी के कवि

सेनापति

(17वीं शताब्दी)

अन्य प्राचीन कवियों की भाँति सेनापति के संबंध में भी बहुत कम जानकारी प्राप्त है। इतना ही ज्ञात है कि ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे तथा इनके पिता का नाम गंगाधर था। इनके एक पद 'गंगा तीर वसति अनूप जिन पाई है के अनुसार ये बुलंदशहर जिले के अनूप शहर के माने जाते हैं। सेनापति के दो मुख्य ग्रंथ हैं- 'काव्य-कल्पद्रुम तथा 'कवित्त-रत्नाकर। इनके काव्य में भक्ति और शृंगार दोनों का मिश्रण है। इनका षट-ॠतु-वर्णन अत्यंत सुंदर बन पडा है, जिसकी उपमाएँ अनूठी हैं।

पद


सिवजू की निध्दि, हनूमान  की सिध्दि,
बिभीषण की समृध्दि, बालमीकि नैं बखान्यो है।
बिधि को अधार, चारयौ बेदन को सार,
जप यज्ञ को सिंगार, सनकादि उर आन्यो है॥
सुधा के समान, भोग-मुकुति-निधान,
महामंगल निदान, 'सेनापति पहिचान्यो है।
कामना को कामधेनु, रसना को बिसराम,
धरम को धाम, राम-नाम जग जान्यो है॥

तुम करतार, जन-रच्छा के करनहार,
पुजवनहार मनोरथ चित चाहे के।
यह जिय जानि 'सेनापति है सरन आयो,
ुजिये सरन, महा पाप-ताप दाहे के॥
जो को कहौ, कि तेरे करम न तैसे, हम
गाहक हैं सुकृति, भगति-रस-लाहे के।
आपने करम करि, हौं ही निबहौंगो तोपै,
हौं ही करतार, करतार तुम काहे के॥

सोहति उतंग, उत्तमंग ससि संग गंग,
गौरि अरधंग, जो अनंग प्रतिकूल है।
देवन कौं मूल, 'सेनापति अनुकूल, कटि
चाम सारदूल को, सदा कर त्रिसूल है॥
कहा भटकत! अटकत क्यौं न तासौं मन,
जातैं आठ सिध्दि, नव निध्दि रिध्दि तू लहै।
लेत ही चढाइबे को, जाके एक बेलपात,
चढत अगाऊ हाथ, चारि फल-फूल है॥

रावन को बीर 'सेनापति रघुबीर जू की,
आयो है सरन, छाँडि ताही मद अंध को।
मिलत ही ताको राम, कोपि कै करी है ओप,
नाम जोय दुर्जन-दलन दीनबंध को॥
देखो दानबीरता, निदान एक दान ही में,
कीन्हें दोऊ दान, को बखानै सत्यसंध को।
लंका दसकंधर की दीनी है बिभीषन को,
संका विभीषन की सो, दीनी दसकंध को।

फूलन सों बाल की, बनाई गुही बेनी लाल,
भाल दीनी बेंदी, मृगमद की असित है।
अंग-अंग भूषन, बनाइ ब्रभूषण जू,
बीरी निज करते, खवाई अति हित है॥
ह्वै कै रस बस जब, दीबे कौं महावर के,
'सेनापति स्याम गह्यो, चरन ललित है।
चूमि हाथ नाह के, लगाइ रही ऑंखिन सौं,
कही प्रानपति! यह अति अनुचित है॥

ॠतु वर्णन

लाल-लाल टेसू, फूलि रहे हैं बिसाल संग,
स्याम रंग भेंटि मानौं मसि मैं मिलाए हैं।
तहाँ मधु काज, आइ बैठे मधुकर-पुंज,
मलय पवन, उपबन-बन धाए हैं॥
'सेनापति माधव महीना मैं पलास तरु,
देखि-देखि भाउ, कबिता के मन आए हैं।
आधे अनसुलगि, सुलगि रहे आधे, मानौ,
बिरही दहन काम क्वैला परचाए हैं।

केतकि असोक, नव चंपक बकुल कुल,
कौन धौं बियोगिनी को ऐसो बिकरालु है।
'सेनापति साँवरे की सूरत की सुरति की,
सुरति कराय करि डारतु बिहालु है॥
दच्छिन पवन ऐतो ताहू की दवन,
जऊ सूनो है भवन, परदेसु प्यारो लालु है।
लाल हैं प्रवाल, फूले देखत बिसाल जऊ,
फूले और साल पै रसाल उर सालु हैं॥

बृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं।
तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी
छाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं॥
'सेनापति नैक, दुपहरी के ढरत, होत
घमका बिषम, ज्यौं न पात खरकत हैं।
मेरे जान पौनों, सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,
घरी एक बैठि, कँ घामै बितवत हैं।

'सेनापति ऊँचे दिनकर के चलत लुवैं,
नदी नद कुवें कोपि डारत सुखाइ कै।
चलत पवन, मुरझात उपवन वन,
लाग्यो है तपन जारयो भूतलों तचाइ कै॥
भीषण तपत, रितु ग्रीष्म सकुच ताते,
सीरक छिपत तहखाननि में जाइकै।
मानौ सीतकाल सीतलता के जमाइबे को,
राखे हैं बिरंचि बीज धरा में धराइ कै॥

 

 

 

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