हिन्दी के कवि

श्रीपति

(17वीं शताब्दी)

श्रीपति कालपी के रहने वाले कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके तीन ग्रंथ प्रसिध्द हैं, 'काव्य-सरोज, कवि-कल्पद्रुम तथा 'अलंकार गंगा। इनकी कविता समासयुक्त होने पर भी सहज है। ॠतु-वर्णन रोचक और चित्रात्मक है।

पद


बैठी अटा पर, औध बिसूरत पाये सँदेस न 'श्रीपति पी के।
देखत छाती फटै निपटै, उछटै जब बिज्जु छटा छबि नीके॥
कोकिल कूकैं, लगै मन लूकैं, उठैं हिय कैं, बियोगिनि ती के।
बारि के बाहक, देह के दाहक, आये बलाहक गाहक जी के॥

जल भरे झूमैं मानौं भूमैं परसत आप,
दसँ दिसान घूमैं दामिनी लये लये।
धूर धार धूसरित धूम से धुँधारे कारे,
घोर धुरवान धाकैं छवि सों छये छये॥
'श्रीपति सुकवि कहैं घरी घरी घहरात,
तावत अतन तन ताप सों तये तये।
लाल बिन कैसे लाज चादर रहैगी आज,
कादर रजत मोहिं बादर नए-नए॥

फूले आसपास कास विमल अकास भयो,
रही ना निसानी कँ महि में गरद की।
गुंजत कमल दल ऊपर मधुप मैन,
छाप सी दिखाई आनि विरह फरद की॥
'श्रीपति रसिक लाल आली बनमाली बिन,
कछू न उपाय मेरे दिल के दरद की।
हरद समान तन जरद भयो है अब,

गरद करत मोहि चाँदनी सरद की॥

 

 

 

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