हिन्दी के कवि

श्यामनंदन किशोर

(1932-1985 ई.)

श्यामनंदन किशोर हिन्दी के मूर्धन्य कवि एवं विद्वान थे। ये बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। इन्हें अंग्रेजी, इटालियन, रूसी, चेक आदि अनेक भाषाएं आती थीं। ये कई बार विदेशों में भाषण देने गए तथा नेशनल प्रोफेसर रहे। इनके मुख्य काव्य-संग्रह है : 'शेफालिका, 'विभावरी, 'बंधूक, 'सूरजमुखी तथा 'कविश्री। 'इडा, 'गायत्री तथा 'सीता इनके महाकाव्य हैं। इन्हें पद्मश्री अलंकरण तथा 'नेहरू फेलोशिप सम्मान प्राप्त हुए।

क्षुद्र की महिमा
शुध्द सोना क्यों बनाया, प्रभु, मुझे तुमने,
कुछ मिलावट चाहिए गलहार होने के लिए!

जो मिला तुममें भला क्या
भिन्नता का स्वाद जाने,
जो नियम में बंध गया,
वह क्या भला अपवाद जाने!

जो रहा समकक्ष, करुणा की मिली कब छांह उसको
कुछ गिरावट चाहिए, उध्दार होने के लिए!

जो अजन्मा हैं, उन्हें इस
इंद्रधनुषी विश्व से संबंध क्या!
जो न पीडा झेल पाए स्वयं,
दूसरों के लिए उनको द्वंद्व क्या!

एक स्रष्टा शून्य को शृंगार सकता है
मोह कुछ तो चाहिए, साकार होने के लिए!
क्या निदाघ नहीं प्रवासी बादलों से
खींच सावन धार लाता है!
निर्झरों के पत्थरों पर गीत लिक्खे
क्या नहीं फेनिल, मधुर संघर्ष गाता है!

है अभाव जहां वहीं है भाव दुर्लभ-
कुछ विकर्षण चाहिए ही, प्यार होने के लिए!

वाद्य यंत्र न दृष्टि पथ पर हो,
मधुर झंकार लगती और भी!
विरह के मधुवन सरीखे दीखते
हैं क्षणिक सहवास वाले ठौर भी!
साथ रहने पर नहीं होती सही पहचान!
चाहिए दूरी तनिक, अधिकार होने के लिए!

 

 

 

 

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