हिन्दी के कवि

सोम ठाकुर

(जन्म 1934 ई.)

सोम ठाकुर का जन्म आगरे में हुआ। इनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। ये आगरा कॉलेज तथा सेंट जॉन कॉलेज में कुछ दिनों तक अध्यापन करने के बाद स्वतंत्र लेखन और मंच को पूर्णत: समर्पित हो गए। ये नवगीत विधा के कुशल कवि हैं। अपने सुदर्शन व्यक्तित्व, सुमधुर कंठ तथा सरस गीतों और छंदों के कारण देश-विदेश के काव्य मंचों पर इन्होंने विशिष्ट स्थान बना लिया है।

गीत
खिडकी पर आंख लगी,
देहरी पर कान।

धूप-भरे सूने दालान,
हल्दी के रूप भरे सूने दालान।

परदों के साथ-साथ उडता है-
चिडियों का खण्डित-सा छाया क्रम
झरे हुए पत्तों की खड-खड में
उगता है कोई मनचाहा भ्रम
मंदिर के कलशों पर-
ठहर गई सूरज की कांपती थकान
धूप-भरे सूने दालान।

रोशनी चढी सीढी-सीढी
डूबा मन
फजीने की मोडों को
घेरता अकेलापन

ओ मेरे नंदन!
आंगन तक बढ आया
एक बियाबान।
धूप भरे सूने दालान।
***
सूर्यमुखी फूल

नीले इस ताल पर
झूल गया सूर्यमुखी फूल।
उलझी है एक याद

बरगद की डाल पर।

जन्मीं फसलें कितनी बार
कितने विषयों की यह चांदनी निचुड गई।
वह नंगे पांवों से अंकित पगडंडी
घने-घने झाडों से पुर गई

लहरों के लेख-चित्र
चुटकी भर झरे बौर
और क्या चढाऊं

इस पूजा के थाल पर।

अब नहीं बंधेंगे वे बांहों के सेतु कभी
केशों के केतु नहीं फहरेंगे।
ध्वनियों में दौडते हुए वे रथ
पीपल की छांह नहीं ठहरेंगे।

इस टूटी खामोशी में फिर से
रख दो यह
गरम-गरम फूल बुझे गाल पर
ठंडे इस भाल पर।

 

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