हिन्दी के कवि

सुंदरदास

(1596-1689 ई.)

सुंदरदास का जन्म जयपुर के द्योसा ग्राम के एक वैश्य परिवार में हुआ। बालपन में ही दादू दयाल का दर्शन हुआ और उनके शरणापन्ना हो गए। इन्होंने 18-19 वर्ष तक काशी में विद्याध्ययन किया और फतेहपुर में 12 वर्ष तक योगाभ्यास। यहीं इन्होंने 40 ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें प्रेम, भक्ति, योग, वेदांत और नीति का सम्मिश्रण है। निर्गुण-पंथी संतों में 'कवि सच्चे अर्थों में सुंदरदास ही हैं। भाषा, भाव, छंद, अलंकार सभी दृष्टि से इनकी कविता खरी उतरती है। 'सुंदर ग्रंथवाली नाम से दो खंडों में इनकी समस्त रचना प्रकाशित हुई है। इन्हें शांत रस का कवि कहा जाता है।

पद

तेल जरै बाती जरै, दीपक जरै न कोइ।

दीपक जरताँ सब कहै, भारी अजरज होइ॥

भारी अचरज होइ, जरै लकरी अरु घासा।

अग्नि जरत सब कहैं, होइ यह बडा तमासा॥

दोहे

गज अलि मीन पतंग मृग, इक-इक दोष बिनाश।

जाके तन पाँचौं बसै, ताकी कैसी आश॥

सुंदर जाके बित्त है, सो वह राखैं गोइ।

कौडी फिरै उछालतो, जो टुटपूँज्यो होइ॥

मन ही बडौ कपूत है, मन ही बडौ सपूत।

'सुंदर जौ मन थिर रहै, तो मन ही अवधूत॥

 

 

 

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