हिन्दी के कवि

स्वदेश भारती

(जन्म 1939 ई.)

स्वदेश भारती बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कवि, उपन्यासकार, कहानीकार और अनुवादक इनके विभिन्न रूप हैं। इन्हें 'चौथा सप्तक में सम्मिलित किया गया है। इनके मुख्य काव्य संग्रह हैं : 'इक्कीस सुबह और, 'तपिस नहीं मिटती, 'भरे हाट के बीच आदि। उपन्यास हैं : 'शवयात्रा, 'शहरयार, 'यातना शिविर तथा 'औरतनामा जिस पर इन्हें 'प्रेमचंद पुरस्कार मिला।

आजादी
क्या वह मर जाएगी?
नहीं! ऐसा नहीं हो सकता
कोशिश यही की जा रही है कि वह जिंदा रहे
भले ही बैसाखियों पर चले।

क्या वह मर जाएगी?
कुछ कहा नहीं जा सकता
सम्भवत: बच ही जाए
कई डॉक्टर लगे हैं
बराबर ऑक्सीजन दिया जा रहा है
दवाइयों से भरे जहाज आ रहे हैं दूर-दूर से
संवेदना के संदेश तार-घरों की
टोकरियां भर रहे हैं
हवा काफी तेज है
और भीड का शोर निरंतर बढ रहा है
सभी खिडकियां बंद कर लो
नहीं, सभी खिडकियां खुली रहने दो
डॉक्टर, डॉक्टर, इतने इंजेक्शन दिए जा चुके
कि कहीं कोई जगह नहीं बची
जहां सुई के निशान न हों
इस पर भी क्या वह मर जाएगी?

पश्चिम की खिडकी बंद कर दो
और पूरब की खिडकी खोल दो
नहीं, पश्चिम की खिडकी खुली रहने दो
और पूरब की बंद कर लो
नहीं, पूरब और पश्चिम की दोनों खिडकियां
खुली रहने दो
लेकिन तब बहुत तेज हवा आएगी
और कमरे की चीजें बेतरतीब हो जाएगी
तो दोनों खिडकियां बंद कर लो
पर तब दोनों खिडकियों के
संतुलन का क्या होगा?
भाड में जाएं दोनों खिडकियां
डॉक्टर! डॉक्टर!
क्या वह जिंदा हो जाएगी?
क्या वह बच जाएगी?

हंगामा
कोलाहल
अनियंत्रित भीड का शोर निरंतर बढता जा रहा है
वह मर रही है
उसकी नसों में विषैला जहर फैलता जा रहा है
काले अजगर जैसी रात बडी भयानक है
यह भीड चुपचाप अपना काम क्यों नहीं करती?
या मुष्टिबध्द हाथों
प्रतीक्षा करे नई सुबह की
अगर उसे जीना है तो जरूर जी जाएगी।
***
अंधेरे के बीच
अंधेरे के बीच मैं आया इस धरती पर
और एक औरत बहुत खुश थी
फिर धरती पर आकाश की ओर बढने लगा
आते-जाते मौसम के बीच
दूधिया पहाडों के सौन्दर्य को आंखों में उतारा
अग्निवाही अमलतास के फूलों से प्यार किया
और मैं बहुत खुश था, खिलता सौंदर्य देख

पिर वसंत आया और चला गया निर्विकार
पत्तों ने पीलापन ओढ लिया
सवेरे ओसकणों के भार से इतराती
फूलों की पंखुडियां झडने लगीं हवा में
और एक जंगल के बीच गुजरते हुए बार-बार
यही महसूस किया कि
जिस अंधेरे से आया था
वही अंधेरा छाया है धरती के आर-पार।

 

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