हिन्दी के कवि

उमाकांत मालवीय

(1931-1982)

उमाकांत मालवीय का जन्म बंबई में हुआ था। शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। इन्होंने कविता के अतिरिक्त खण्डकाव्य, निबंध तथा बालोपयोगी पुस्तकें भी लिखी हैं। काव्य-क्षेत्र में मालवीयजी ने नवगीत विधा को अपनाया। इनका मत है कि आज के युग में भावों की तीव्रता को संक्षेप में व्यक्त करने में नवगीत पूर्णतया सक्षम है। मुख्य कविता-संग्रह हैं : 'मेहंदी और महावर, 'देवकी, 'रक्तपथ तथा 'सुबह रक्तपलाश की।

फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
धूल मेजपोश पर जमी हुई।
जहां-तहां पडी दस किताबों पर
घनी सौ उदासियां थमी हुई।

पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

अरसे से बदला रुमाल नहीं
चाभी क्या जाने रख दी कहां।
दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
चीज नहीं मिलती रख दो जहां।

चौके की धुआंती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
किसे पडी, मछली-सी तडप जाए
गाल शेव करने में छिल गया।
तुमने जो कलम एक रोपी थी
उसमें पहला गुलाब खिल गया।

पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

कभी-कभी
कभी-कभी बहुत भला लगता है-
चुप-चुप सब कुछ सुनना
और कुछ न बोलना।

कमरे की छत को
इकटक पडे निहारना
यादों पर जमी धुल को महज बुहारना
कभी-कभी बहुत भला लगता है-

केवल सपने बुनना
और कुछ न बोलना।

दीवारों के उखडे
प्लास्टर को घूरना
पहर-पहर संवराती धूप को बिसूरना
कभी-कभी बहुत भला लगता है

हरे बांस का घुनना
और कुछ न बोलना।

कागज पर बेमानी
सतरों का खींचना
बिना मूल नभ छूती अमरबेल सींचना
कभी-कभी बहुत भला लगता है।

केवल कलियां चुनना
और कुछ न बोलना।

अपने अंदर के
अंधियारे में हेरना
खोई कोई उजली रेखा को टेरना
कभी-कभी बहुत भला लगता है

गुमसुम सब कुछ सुनना
और कुछ न बोलना।

 

जिन्दगी नेपथ्य में गुजरी
जिन्दगी नेपथ्य में गुजरी
मंच पर की भूमिका तो सिर्फ अभिनय है।
मूल से कट कर रहे
परिशिष्ट में
एक अंधी व्यवस्था की दृष्टि में।
जिन्दगी तो कथ्य में गुजरी
और करनी
प्रश्न से आहत अनिश्चय है।

क्षेपकों के
हाशियों के लिए हम
दफन होते
कागजी ताजिए हम
जिन्दगी तो पथ्य में गुजरी
और मन बीमार का परहेज संशय है।

 

 

 

 

top