हिन्दी के कवि

वीरेन्द्र सक्सेना

(जन्म 1941 ई.)

इनका जन्म फरीदपुर, बरेली में हुआ। इन्होंने सांख्यिकी, हिन्दी तथा संस्कृत विषयों में एम.ए. तथा हिन्दी में पी-एच.डी. की। सम्प्रति केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय में उपनिदेशक हैं। सक्सेना- मूलत: कहानीकार हैं, किंतु कविरूप में भी सुपरिचित हैं। इनका काव्य-संग्रह है : 'ठोस होते हुए। इसके अतिरिक्त इन्होंने उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं। ये हिन्दी अकादमी दिल्ली के साहित्य कृति पुरस्कार से सम्मानित हैं।

विश्वास
जिंदगी बहुत छोटी है मित्र
पर विश्वास जिंदगी से बडा है।

आदमी ने जो भी काम किए हैं
दुनिया में,
केवल विश्वास के बल पर किए हैं।
आत्मविश्वास भी
एक प्रकार का विश्वास ही तो है।

आत्मविश्वास हो या मित्रों पर विश्वास
मतलब दोनों का एक ही है।
क्योंकि जब खुद की आत्मा
झूठी पडने लगती है,
तभी मित्रों का विश्वास भी
दगा देता है।

***
दावे और वादे
मैंने तुमको जान लिया है
यह दावा तो मैं नहीं करूंगा
क्योंकि दावों पर मुझे यकीन नहीं।

मैं उन लोगों में भी नहीं हूँ
जो एक सांस में दावे करते हैं
और दूसरी में वादे।
दावे और वादे, वादे औ दावे
दुनिया को जीतने के लिए
वे इन्हीं झूठे हथियारों का सहारा लेते हैं।

मैं तुमसे कोई वादा भी नहीं दोहराऊंगा
क्योंकि वादों पर भी मुझे यकीन नहीं।

मैं तो केवल मन की बात करूंगा,
क्योंकि तुम्हारा मन
अगर मेरे मन की बात समझता है,
तो वही सबसे बडा वादा है,
और वही मेरा दावा भी।

 

 

 

 

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