धागे

निर्मल वर्मा

पेज 1

उस रात खाने के बाद कॉफी पीते हुए हम केशी के नये रिकॉर्डों की चर्चा करने लगे।

-- मुझे तो रात को नींद नहीं आती मैं ने ग्रामोफोन लायब्रेरी में रखवा दिया है। --मीनू ने कहा।

-- क्या वह अब भी पीते हैं? --मैं ने धीरे से पूछा-- केशी दूसरे कमरे में है।

-- हाँ, लेकिन मेरे कमरे में नहीं। --मीनू ने दरवाजा खोलकर परदा उठा दिया। बरामदे के परे लॉन अंधेरे में डूबा था। एक अपरिचित-सी घनी-सी शान्ति सारे अहाते में फैली थी। हम कॉफी पी चुके थे और अपने अपने खाली प्यालों के आगे बैठे थे। मीनू कुर्सी खिसका कर मेरे पास सरक आयी।

-- तुम्हारे हाथ बहुत ठण्डे हैं। --उसने मेरे दोनों हाथ अपनी मुट्ठियों में भर लिये-- तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी? शैल तुम्हारी राह देखते-देखते अभी सोई है।

-- मैं फाटक से तुम्हारे कमरे तक भागती आई थी। --मैंने कहा। मैंने झूठ कहा था। मैं मीनू से यह नहीं कहूंगी कि मैं पिछले आधे घंटे से लॉन में अकेली बैठी रही थी । कहूंगी, तो वह विश्वास नहीं करेगी।

-- क्यों तुम्हें अब भी अंधेरे से डर लगता है? --मीनू हंस रही थी। उसका एक हाथ अब भी मेरी गोद में पडा था। बिजली की रोशनी में उसकी सफ़ेद पतली बांहें बहुत सफ़ेद थीं, बहुत पतली थीं। मुझे अजीब सा लगता। केशी इन हाथों को कैसे चूमता होगा? कैसे इन बांहों के महीन भूरे रोयों को सहलाता होगा?

-- सुनो परसों रात तुम क्या कर रही थीं?

-- क्यों अपने कमरे में थी। -- मैं ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।

-- कनॉट प्लेस से घर लौटते हुए हम तुम्हारे हॉस्टल आये थे।

-- बहका रही हो? --मैं ने कहा।

-- सच आये थे। केशी से पूछ लेना। लेकिन इतनी रात भीतर कैसे आते तुम्हारी मिसेज हैरी देखतीं तो हमें कच्चा चबा जातीं। --वह हंस रही थी।

-- क्या तुम लोग रुके थे?

-- हम हॉस्टल के बाहर खडे रहे थे तुम्हारे कमरे की बत्ती जली थी। केशी ने कई बार हॉर्न बजाया था। हमने सोचा था तुम हमारी कार का हॉर्न पहचान जाओगी, लेकिन तुमने सुना नहीं।

-- मैं शायद सो गई थी । मुझे कुछ पता भी नहीं चला।

-- तुम अब भी लाइट जला कर सोती हो? --मीनू ने पूछा-- मिसेज हैरी कुछ नहीं कहतीं?

-- यह वर्किंग वीमेन्स हॉस्टल है, और मिसेज हैरी कोई कॉन्वेन्ट स्कूल की मेट्रन थोडे ही हैं। --मैं ने कहा। मीनू समझ गई। हम दोनों को एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई थी और हम दोनों हंसने लगे थे।

उन दिनों मैं और मीनू स्कूल के हॉस्टल में रहा करते थे। कमरे में बत्ती जला कर सोने की सख़्त मनाही थी। अंधेरे में डर के मारे मेरी देह के पोर-पोर से पसीना छूटने लगता था और मैं सबकी आंख बचाकर चोरी- चुपके बत्ती जला लेती थी। डिनर के दो घंटे बाद जब कभी मैट्रन कमरों का राउंड लगाने आती तो मेरा दिल रह-रह कर दहल जाता। मैं आंखें मूंद कर प्रार्थना करती रहती। किन्तु मैट्रन की आंखें चील की तरह तेज़ थीं। उन्हें धोखा देना आसान नहीं था। वह बडबडाते हुए मेरे कमरे में आतीं और बत्ती बुझा जातीं। किन्तु जब वह मेरे कमरे से जाने लगतीं तो मैं कांपते हाथों से उनकी स्कर्ट पकड लेती-- प्लीज मैट्रन! --वह हत्बुध्दि सी मेरी ओर देखने लगतीं और झिडक़ने लगतीं-- क्या बात है, यह क्या बचपना है? --वह कहतीं, किन्तु मैं उनकी स्कर्ट पकडे रहती और सिसकते हुए बार बार कहती-- प्लीज मैट्रन,प्लीज-प्लीज

सारे हॉस्टल में यही बात फैल गयी थी। ऊंची क्लास की लडक़ियां या मीनू की सहेलियां जब भी मुझे देखतीं, हंसते हुए बार - बार कहतीं-- प्लीज मैट्रन, प्लीज-प्लीज, प्लीज

-- मीनू, शिमला याद आता है। न जाने कितने बरस बीत गये? --मैं ने कहा।

-- हमने सोचा है‚ अगली गर्मियों में वहां जायेंगे। केशी ने अभी तक शिमला नहीं देखा। तुम्हें उन दिनों छुट्टी मिल जायेगी?

मैं मीनू को देखती हूं, मुझे कुछ समझ नहीं आता।

-- तुम्हें नहीं मालूम, तुम कैसी हो गयी हो । कभी शीशे में अपना चेहरा देखा है?

-- हाँ, देखा है बडा प्यारा-सा लगता है। --मैं ने कहा।

-- नहीं रूनी मजाक की बात अलग है। तुम्हें हमारे संग चलना होगा। जब से तुम जबलपुर से आई हो।

लेकिन मीनू आगे कुछ नहीं बोलती। शायद आगे मौन का एक दायरा है जिसे हम दोनों छूते हुए कतराते हैं। शायद मेरा चेहरा बहुत सफ़ेद-सा हो गया है और वह डर सी गई है।

मीनू कुर्सी से उठकर मेरे पास, बहुत पास आ गई। उसने मेरे गले में अपने दोनों हाथ डाल दिये। उसकी आंखों में अजीब सा विस्मय है। मुझे भ्रम होता है कि वह मेरे और केशी के बारे में सब-कुछ जानती है वे बातें जो सिर्फ़ मेरी हैं, जिन्हें मैं अपने से भी छिपा कर रखती हूं। किन्तु वह कभी मुझ से कहेगी नहीं वह बडी बहन है, इसलिये वह मार्टर है। वह हमेशा मुझे अपने से बहुत छोटा समझती रहेगी।

ये कुछ ऐसे क्षण हैं, जब मैं मीनू से घृणा करती हूं। बचपन से करती आई हूं।

कमरे में सन्नाटा खिंचा रहा। न जाने हम दोनों कितनी देर तक ऐसे ही बैठे रहे।

-- तुम बुरा मान गईं। --उसका स्वर भीगा-सा था।

-- तुम पागल हो, मीनू!

-- इस तरह हॉस्टल में अकेले कब तक रहोगी?

मैं ने उसकी ओर हंसते हुए देखा।

-- अब मुझे डर नहीं लगता।

मीनू कुछ बोली नहीं, चुपचाप अपनी उंगलियों को मेरे बालों में उलझाती रही। उसकी आंखे बहुत उदास हैं। वह मुझ से बडी है, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि मैं उस से छोटी हूं। लगता है, जैसे दिन बीतते जाते हैं और वह वहीं...एक ही स्थान पर...खडी रही है, जहां वह बरसों पहले थी। फिर भी उसके सामने मैं अपने को हमेशा ही बहुत हीन पाती हूं। लगता है वह सब कुछ है, मैं उसके सामने कुछ भी नहीं। यह उसका बडप्पन नहीं...वह होता तो कुछ भी मुश्किल नहीं था; तब मैं उससे लड़ लेती; उसे दोष देकर छुटकारा पा लेती। लगता है, जैसे वह कहीं बहुत ऊँची दीवार पर बैठी है और मैं उसे सिर उठाकर विस्मित आँखों से देख रही हूँ।

-- रूनी बहुत देर हो गयी, तुम कपडे नहीं बदलोगी? --मीनू उठ खडी हुई।

-- ठहरो चलती हूं। यह स्वेटर किसका है? --मेरी निगाहें सामने सोफ़े पर टिक गईं जहां हल्के सलेटी रंग के ऊन की लच्छियां और उनमें उलझी सलाइयां पडीं थीं।

-- केशी का पुलोवर है पूरी बांहों का। --बुना हुआ हिस्सा उठा कर उसने मेरे हाथों में रख दिया।

-- कैसा है, कल ही शुरु किया है। --मैं ने उसे छुआ नहीं, एक लम्बे क्षण तक उसे अपने हाथों पर वैसे ही पडा रहने दिया। मेरे हाथ उसके नीचे दब गये हैं। उसके नीचे दब कर सिकुड से गये हैं। मीनू की स्निग्ध, शांत आँख और मेरे काँपते हाथों के बीच केशी का अधबुना स्वेटर एक लम्बे पल के लिये बिना हिले-डुले पड़ा रहता है।

मैं ने आज तक केशी को फुल-स्लीव का पुलोवर पहने नहीं देखा। पता नहीं उस पर कैसा लगेगा?

मीनू ड्राईंगरूम में चली गई। मैं कुछ देर तक उस कमरे में अकेली बैठी रहती हूँ। सब ओर सन्नाटा है। केवल किचन से प्यालों और प्लेटों की हल्की खनखनाहट सुनाई दे जाती है। दरवाज़े क़ी जाली पर फीकी सी चांदनी उतर आई है।

खिड़की के परे बरामदा है, लाल बजरी की सड़क है। उसके पीछे मोटर रोड को लांघ कर पहाड़ी आती है, जिसके टीले लॉन से दिखाई देते हैं और लॉन में पत्तियां हैं, हवा में सरसराती घास है।

-- तुम अभी तक यहां बैठी हो? --मीनू के स्वर में हल्की सी झिड़की थी। मैं चौंक गई। केशी का स्वेटर अब भी मेरी गोद में पड़ा था।

-- मीनू क्या झाड़ियों में बेर आ गये?

-- अभी कहाँ? कहीं दिसम्बर में जाकर पकेंगे। याद नहीं पिछले साल इन्हीं दिनों हम पहाडी पर पिकनिक पर गये थे। बेर खाकर शैल का गला पक आया था।

-- वे कच्चे थे। तुमने पके बेर नहीं खाये, बिलकुल काफल जैसे मीठे होते हैं । मीनू, शिमले के काफल याद हैं?

-- और खट्टे दाडू । तुम उनका लाल रस अपनी उंगली पर लगाकर कहती थीं-- 'यह मेरा ख़ून है' और मां डर जाती थीं।

हम उस क्षण भूल गये कि इन बरसों के दौरान ढेर सी उम्र हम पर लद गई है; कि बरसों पहले उसका विवाह हुआ था और मैं एक बच्चे की माँ हूँ। हम दरवाज़े पर खड़े-ख़ड़े देर तक एक दूसरे को वे बातें याद दिलाते रहे, जो हम दोनों को मालूम थीं, जिन्हें हमने कितनी बार दुहराया था, किन्तु हर बार यही लगता था कि हम उन्हें भूल गये हों, हर बार उन्हैं दुबारा याद करने का बहाना-सा करते थे।

-- कल तुम्हारा ऑफ़ डे है। हम लोग पहाड़ी पर जायें तो कैसा रहे?

-- सच! --मैं ने ख़ुशी से मीनू का हाथ पकड़ लिया।

 

 

top