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नताशा

सौरभ कुमार

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नताशा

 

शुचिराय आज अपने सोफे पर इतमीनान की अवस्था में बैठे हुए थे। आज उनकी भतीजी अपने मंगेतर के साथ मिलकर जा चुकी थी। वह उसका मंगेतर इसलिए नहीं था कि उसने मंगनी किया था। उनकी दोस्ती लंबी चल चुकी थी और उन्होनें आगे रिश्ते में बंधने का निर्णय कर लिया था। इसलिए वह उसका मंगेतर हीं था। जब परिवार वाले लड़के-लड़की को मिलाते हैं तो मंगनी की रस्म की जाती है लेकिन जब बच्चे स्वयं तय करने लगें तो वह रिश्ता अपने आप मंगनी का रूप ले लेता है। स्वयं उनके लिए, परिवार के लिए और जानने वाले समाज के लिए भी। बात सिर्फ इतनी होती है कि वो निभाना चाहते हैं।

शुचि हमेशा इस समाज के भीतर के रवैये से डरे रहते थे। लेकिन जिस लड़के को तीन साल से नताशा के दोस्त के रूप में जान रहे थे वह आज अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार कर लिया तो वो निश्चिंत हो चले। ऐसा नहीं कि शुचि नताशा के गार्जियन थे। नताशा अपने पिता और मम्मा की लाडली थी। वो उसके अपने चाचा थे। नताशा उनकी भतीजी हीं नहीं थी। अपनी बेटी के बराबर कहना भी सही नहीं होगा। उनकी जिदंगी ही नताशा के इर्दगिर्द थी। उन्होंने खुद शादी नहीं की थी। ऐसा नहीं कि रिश्ते नहीं आये थे। परंतु वो खुद संतुष्ट नहीं हो पाये। रिश्ते तो अच्छी-अच्छी लड़की के आये थे। जिंदगी ने उन्हें जो जख्म दिये थे उसमें उन्हें लगा वो उन अच्छी लड़की के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे। नताशा के पिता उदार और खुले स्वभाव के व्यक्ति थे। वो पैसे तो कमा लेते थे परंतु उन्हें पैसा बनाना नहीं आता था। वो वर्तमान के जिम्मेदारी को निभाने में विश्वास करते थे। भविष्य को ईश्वर के हाथों में सौंप चुके थे। ईश्वर के हाथों में सौंप देने से समस्या खत्म नहीं हो जाती है। अगर सरकार के कानून बना देने से समस्या हल हो जाती तो कई समस्याओं की तरह जीवनसाथी चयन के नियमों और उसकी व्यवहारिकता की भी समस्या हल हो जाती। अगर ऐसा होता तो शुचिबाबू के बड़ी बहनों की शादी में व्यवहारिक अड़चने नहीं आती। इसलिए सबकुछ के बावजूद अगर बड़े भाई साहब आस्थावान बने रह सके तो भी शायद शुचिबाबू अपने छोटे उम्र के अनुभव से नहीं निकल सके। उन्हें हमेशा ऐसा लगता कि उनके भीतर एक अदृश्य गांठ बन चुकी है। इस अहसास नें उन्हें तथाकथित अच्छी लड़की का पति बनने से रोक दिया और वो ऐसी लड़की ढूँढ नही पाये जो अच्छी न हों और उस से न्याय कर पायें, जिसके साथ एक मित्र की तरह अपने जज्बात कह सकें।

वात्सल्य इस लिए रस नहीं है कि तुम्हारें बच्चे हों और तुम्हारे भीतर अपनत्व का भाव उठे। जब तुम अपनों को अपना मानते हो तो बच्चे भी व्यक्तिगत नहीं रह जाते। सबके हो जाते हैं। वे तुम्हारे भीतर के भाव का आश्रय ढूँढ लेते हैं। बिना विवाह के बंधन को जाने हीं नताशा के जिंदगी ने हीं उन्हें पूर्णता दे दिया था। ये बात खुद नताशा के लिए नहीं कही जा सकती थी। उसके लिए वो एक बहुत हीं अच्छे चाचा थे। जो उसकी हर बात को पूरा करते थे। हर बात को मानते थे। उसकी बीमारी जिनका नींद खत्म कर देती थी।

शुचिबाबू ने जिंदगी के इन उलझन से निकल अपनी जिंदगी को एक रूप दिया था। ना तो वह संन्यास था। ना वह सांसारिक, इतना अवश्य था जो भी वो कमा पाये वह नताशा के जिंदगी के अड़चनों से बचाने के लिए था। ऐसा नहीं वह उनकी जिंदगी की सफलता थी, यह सिर्फ उनके जीवन की एक रूप की सार्थकता थी।

ऐसा नहीं खुद उनके जीवन में प्यार की भावना नहीं आई थी। आई थी और उसमें वह बहे भी। लेकिन इस जमाने की प्यार करने की कला वो नहीं सीख पाये। उन्हें प्यार करना नहीं आया। वो न तो अच्छे लवर बन पाये और ना हीं अच्छे फ्रेंड ही बन पाये थे। एक बार के बाद वो फिर कदम नहीं बढ़ा पाये। उनके लिए यह प्यार का टीका बन कर रह गया। कहते हैं जिस रोग से बचना हो उसकी अल्प मात्रा शरीर में प्रवेश करा दो तो उसकी अल्पमात्रा फिर उस रोग से बचाये रखती है। इस तरह शुचि को वो टीका लग गया था और फिर वो जज्बात कहीं उनमें खो से गये।

वो आज चवालीस के हो चुके थे और आज उन्हें नताशा ने सरप्राईज गिफ्ट दे दिया था। जिस संपत्ति को जमा कर वह नताशा के लिए रखे हुए थे आज उसकी जो भी उपयोगिता हो, भले हीं वह नताशा के हीं काम क्यूँ न आये। आज वह अपना मूल्य खो चुका था। कहीं न कहीं वो खुद भी मूल्य खो चुके थे। नताशा ने स्वयं अपना रास्ता चुन लिया था| उसे उस धन की दरकार नहीं रह गयी थी। वो खुद भी कमा रही थी और उसके रिश्ते की आधार की भूमि उसके लिए जमा की हुई पूँजी नहीं थी।

आज वो अपने जिंदगी का मूल्यांकन कर रहे थे। यह सही है कि एक तरह से वो एक निरर्थक जिंदगी जीये थे और एक बात की उन्हें खुशी भी थी उन्होनें यह दिन भी देख लिया था। उन्हें याद आया जब स्कूल में वे छात्र थे, जब स्वतंत्रता दिवस के नाम पर पुरखों के गीत गाये जाते थे और वर्तमान में नपुंसकता का व्यवहार होता था। जब एक स्वतंत्रता दिवस के पूर्वसंध्या पर इलाहाबाद की तीन सगी बहनों ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि उनके पिता के पास देने के लिए दहेज के पैसे नहीं थे और लड़की समाज में अविवाहित नहीं रह सकती है। तब उन्होनें अपने भाषण में कह दिया था, भारत कैसे सुपरपावर बन सकता है जिस देश की लड़कियाँ इस लिए आत्महत्या करती हैं कि उनके पास देने के लिए दहेज के पैसे नहीं है। आज उन्हें लगा भारत सनातन है, अभी भी उम्मींदे खत्म नहीं हुई हैं। भारत का दिल आज भी धड़क सकता है।


 

  सौरभ कुमार का साहित्य  

 

 

 

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