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सूरदास

श्रीकृष्णबाल-माधुरी

राग सोरठ

जसुमति रिस करि-करि रजु करषै |
सुत हित क्रोध देखि माता कैं, मन-हीं-मन हरि हरषै ||
उफनत छीर जननि करि ब्याकुल, इहिं बिधि भुजा छुड़ायौ |
भाजन फोरि दही सब डार्‌यौ, माखन-कीच मचायौ ||
लै आई जेंवरि अब बाँधौं, गरब जानि न बँधायौ |
अंगुर द्वै घटि होति सबनि सौं, पुनि-पुनि और मँगायौ ||
नारद-साप भए जमलार्जुन, तिन कौं अब जु उधारौं |
सूरदास-प्रभु कहत भक्त हित जनम-जनम तनु धारौं ||

भावार्थ :-- यशोदाजी क्रोध करके बार-बार रस्सी खींच रही हैं | अपने पुत्र की भलाई
(उसके सुधार) के लिये माताका क्रोध देखकर श्याम मन-ही-मन प्रसन्नहो रहे हैं | उफनते
दूधके बहाने माताको व्याकुल करके मोहनने हाथ छुड़ा लिया और बर्तन फोड़कर सारा दही
ढुलका दिया तथामक्खन (भूमिपर गिराकर ) उसकी कीच मचा दी| (इससे और रुष्ट होकर
माता) रस्सी ले आयी कि `अब तुम्हें बाँधती हूँ ; किंतु (बाँधनेका) गर्व समझकर बन्धन
में नहीं आये | (माताने) बार-बार और रस्सियाँ मँगायी; किंतु सभी दो अंगुल छोटी ही
पड़ जाती थीं, सूरदासजी कहते हैं, मेरे प्रभु (मन-ही-मन कहने लगे-`देवर्षि नारदजीके
शापसे (कुबेरके पुत्र) यमलार्जुन(सटे हुए अर्जुनके दो वृक्ष हो गये हैं, इनका अब
उद्धार  कर दूँ; क्योंकि मैं तो भक्तोंके लिये ही बार-बार अवतार लेकर शरीर धारण
करता हूँ |'

National Record 2012

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Bihar became the first state in India to have separate web page for every city and village in the state on its website www.brandbihar.com (Now www.brandbharat.com)

See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217