
राग सारंग
(माई) नैकुहूँ न दरद करति, हिलकिनी हरि रोवै |
बज्रहु तैं कठिनु हियौ, तेरौ है जसोवै ||
पलना पौढ़ाइ जिन्हैं बिकट बाउ काटै ||
उलटे भुज बाँधि तिन्हैं लकुट लिए डाँटै ||
नैकुहूँ न थकत पानि, निरदई अहीरी |
अहौ नंदरानि, सीख कौन पै लही री ||
जाकौं सिव-सनकादिक सदा रहत लोभा |
सूरदास-प्रभु कौ मुख निरखि देखि सोभा
भावार्थ :-- (एक गोपी कहती है-) `सखी ! तनिक भी पीड़ाका तुम अनुभव नहीं करती हो ?
(देखो तो) श्यामहिचकी ले-लेकर रो रहा है | यशोदाजी ! तुम्हारा हृदय तो वज्रसे भी
कठोर है | जिसे पलनेपर लिटा देनेपर भी तीव्र वायुसे कष्ट होता है, उसीको हाथ उलटे
करके बाँधकर तुम छड़ी लेकर डाँट रही हो ? तुम्हारा हाथ तनिक भी थकता नहीं? (सचमुच
तुम) दयाहीन अहीरिन ही हो | अरी नन्दरानी ! यह (कठोरताकी) शिक्षा तुमने किससे पायी
है ?' सूरदासजी कहते हैं कि मेरे जिस प्रभुका दर्शन पाने के लिये शंकरजी तथा सनकादि
ऋषि भी सदा ललचाते रहते हैं | (माता) तुम उनके मुखकी शोभा को एक बार भली प्रकार
देखो तो सही ! (फिर तुम्हारा क्रोध स्वयं नष्ट हो जायगा |)
Bihar became the first state in India to have separate web page for every city and village in the state on its website www.brandbihar.com (Now www.brandbharat.com)
See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217