
राग धनाश्री
कहा भयौ जौ घर कैं लरिका चोरी माखन खायौ |
अहो जसोदा! कत त्रासति हौ, यहै कोखि कौ जायौ ||
बालक अजौं अजान न जानै केतिक दह्यौ लुटायौ |
तेरौ कहा गयौ? गोरस को गोकुल अंत न पायौ ||
हा हा लकुट त्रास दिखरावति, आँगन पास बँधायौ |
रुदन करत दोउ नैन रचे हैं, मनहुँ कमल-कन-छायौ ||
पौढ़ि रहे धरनी पर तिरछैं, बिलखि बदन मुरझायौ |
सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, हँसि करि कंठ लगायौ ||
भावार्थ :-- (कोई गोपी कहती है-)`क्या हुआ जो घरके लड़केने चोरीसे मक्खन खा
लिया ? अरी यशोदाजी ! इसे क्यों भयभीत करती हो, आखिर यह तुम्हारी इसी कोख
(पेट) से (तो) उत्पन्न हुआ है | अभी यह अनजान बालक है, यह समझता नहीं कि
कितनी दही मैंने ढुलका दिया | किंतु तुम्हारी हानि क्या हुई ? तुम्हारे पास तो इतना
गोरस है कि पूरा गोकुल उसका अन्त (थाह) नहीं पा सकता | हाय, हाय छड़ी लेकर तुम इसे
भय दिखलाती हो और (खुले) आँगनमें पाशसे बाँध रखा है ! रोनेसे इसके दोनों नेत्र ऐसे
हो गये हैं मानो कमलदल पर जलकण छिटके हों | यह पृथ्वी पर तिरछे होकर लेट रहा है,
रोते रोते इसका मुख मलिन पड़ गया है |' सूरदासके स्वामी तो रसिक-शिरोमणि हैं, (माता
ने रस्सी खोलकर ) हँसकर उन्हें गले लगा लिया |
Bihar became the first state in India to have separate web page for every city and village in the state on its website www.brandbihar.com (Now www.brandbharat.com)
See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217