
गोवर्द्धनधारण
गिरि पर बरषन लागे बादर ||
मेघवर्त्त, जलवर्त, सैन सजि, आए लै लै आदर ||
सलिलि अखंड धार धर टूटत, किये इंद्र मन सादर |
मेघ परस्पर यहै कहत हैं, धोई करहु गिरि खादर ||
देखि देखि डरपत ब्रजवासी , अतिहिं भए मन कादर |
यहै कहत ब्रज कौन उबारै, सुरपति कियैं निरादर ||
सूर स्याम देखैं गिरि अपनैं. मेघनि कीन्हौ दादर |
देव आपनी नहीं सम्हारत, करत इन्द्र सौ ठादर ||69||
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217