
गोवर्द्धनधारण
सुरगन सहित इंद्र ब्रज आवत |
धवल बरन ऐरावल देख्यौ उतरि गगन तैं धरनि धँसावत ||
अमरा-सिव-रबि-ससि चतुरानन, हय-गय बसह हंस-मृग जावत |
धर्मराज, बनराज, अनल, दिव, सारद, नारद, सिव-सुत भावत ||
मेढ़ा, महिष, मगर, गुदरारौ, मोर, आखु, मनवाह गनावत गावत |
ब्रज के लौग देखि डरपे मन, हरि आगैं कहि कहि जु सुनावत ||
सात दिवस जल बरषि सिरान्यौ, आवत चल्यौ ब्रजहिं अतुरावत |
घेरौ करत जहाँ तहँ ठाढ़े, ब्रजबासिन कौं नाहिं बचावत ||
दूरहिं तैं बाहन सौ, उतर्यौ, देवनि सहित चल्यौ सिर नावत |
आइ पर्यौ चरननि तर आतुर, सूरदास-प्रभु सीस उठावत ||78||
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217