
उद्धव-गोपी संवाद-- चौथा संवाद
(ऊधौ) ना हम बिरहिनि ना तुम दास |
कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास ||
बिरही मीन मरै जल बिछुरैं , छाँड़ि जियन की आस |
दास भाव नहिं तजत पपीहा, बरषत मरत पियास ||
पंकज परम कमल मैं बिहरत, बिधि कियौ नीर निरास |
राजिव रवि कौ दोष न मानत, ससि सौ सहज उदास ||
प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कैं बनवास |
सूर स्याम सौं दृढ़ ब्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास ||109||
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217