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सूरदास

श्रीकृष्णबाल-माधुरी

राग रामकली

माखन खात पराए घर कौ |
नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट-घमरकौ ||
कितने अहिर जियत मेरैं घर, दधी मथि लै बेंचत महि मरकौ |
नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ ||
ताके पूत कहावत  हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ |
सूर स्याम कितनौ तुम खैहौ, दधि-माखन मेरैं जहँ-तहँ ढरकौ ||

भावार्थ :-- सूरदासजी कहते हैं-(माता समझाती हैं-) `तुम दूसरेके घरका मक्खन  
खाते हो ! (तुम्हारे घरमें) प्रतिदिन सहस्त्रों मथानियोंसे दही मथा जाता है,
दहीके मटको से जो घरघराहट निकलती है, वह मेघगर्जनाके समान होती है | कितने
ही अहीर मेरे घर जीते (पालन-पोषण पाते) हैं, दही मथकर वे मट्ठेके मटके बेच
लेते हैं | व्रजराज श्रीनन्दजीका बड़ा नाम है, उनके यहाँ प्रतिदिन नौ लाख गायें
दुही जाती है | उनके तुम पुत्र कहलाते हो और चोरी करके छप्पर उजाड़ते (अपने
घरकी कंगाली प्रकट करते) हो | श्यामसुन्दर! तुम कितना खाओगे, दही-मक्खन तो
मेरे घर जहाँ-तहाँ ढुलकता फिरता है |'

National Record 2012

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