
राग बिलावल
तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ |
दुपहर दिवस जानि घर सूनौं, ढूँढ़ि-ढँढ़ोरि आपही आयौ ||
खोलि किवार, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ |
ऊखल चढ़ि सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ ||
दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ |
सूरस्याम कौं हटकि न राखै, तै ही पूत अनोखौ जायौ ||
भावार्थ :-- सूरदासजी कहते हैं- (एक गोपी उलाहना देती है-)
तुम्हारे लालने मेरा मक्खन खाया है | दिन में दोपहरके समय घरको
सुनसान समझकर स्वयं ढूँढ़-ढ़ाँढ़कर इसने स्वयं खाया ( अकेले ही खा लेता तो
कोई बात नहीं थी| किवाड़ खोलकर, घरमें घुसकर सारा दूध -दही इसने सखाओं
को खिला दिया | ऊखलपर चढ़कर छींकेपर रखा गोरस भी ले लिया और जो अच्छा
नहीं लगा, उसे पृथ्वीपर ढुलका दिया |प्रतिदिन इसी प्रकार गोरसकी बरबादी हो रही
है, तुमने इस पुत्रको किस ढंगपर लगा दिया | श्यामसुन्दर को मना करके घर
क्यों नहीं रखती हो | क्या तुमने ही अनोखा पुत्र उत्पन्न किया है ?
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217