
मुख छबि देखि हो नँद-घरनि !
सरद-निसि कौ अंसु अगनित इंदु-आभा-हरनि ||
ललित श्रीगोपाल-लोचन लोल आँसू-ढरनि |
मनहुँ बारिज बिथकि बिभ्रम, परे परबस परनि ||
कनक मनिमय जटित कुंडल-जोति जगमग करनि |
मित्र मोचन मनहुँ आए ,तरल गति द्वै तरनि ||
कुटिल कुंतल, मधुप मिलि मनु कियो चाहत लरनि |
बदन-कांति बिलोकि सोभा सकै सूर न बरनि ||
भावार्थ :-- (गोपी कहति है-) नन्दरानी! (अपने लालके) मुखकी शोभा तो देखो, यह तो
शरद्की रात्रिके अगणित किरणोंवाले चन्द्रमाओंकी छटाको भी हरण कर रहा है | श्रीगोपाल
के सुन्दर (एवं) चञ्चल नेत्रोंसे आँसुओंका ढुलकना ऐसा (भला) लगता है मानो कमल (कोश)
में क्रीड़ासे अत्यन्त थककर भौंरे विवस गिरे पड़ते हों | मणिजटित स्वर्णमय कुण्डलों
की कान्ति इस प्रकार जगमग कर रही है, जैसे अपने मित्र (कमल) को छुड़ानेके लिये दो
चञ्चल गतिवाले सूर्य उतर आये हों! घुँघराली अलकें तो ऐसी लगती हैं मानो भ्रमरोंका
समूह एकत्र होकर युद्ध करना चाहता है |' सूरदासजी कहते हैं कि यह मुखकी कान्ति
देखकर (जो कि देखनेही योग्य है) उसकी शोभाका वर्णन मैं नहीं कर पाता |
Bihar became the first state in India to have separate web page for every city and village in the state on its website www.brandbihar.com (Now www.brandbharat.com)
See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217